Thursday, November 24, 2016

The Secret Of Happiness Learn To Discover Happiness in Life

परिस्थितियां दुःख का कारण नहीं है।
Key Of Happiness Is In Your Hand
The Secret Of Happiness
Learn To Discover Happiness in Life
असली कारण, जो हम नहीं करना चाहते उसके लिए हमेशा Justification, उसके लिए हमेशा न्यायुक्त कारण खोज लेते है। और बेफिक्र हो जाते हैं। ऐसी कौन सी परिस्थिति हैं जिसमें आदमी शांत हो सके ? ऐसी कौन सी परिस्थिति हैं जिसमें आदमी प्रेमपूर्ण हो सके ? ऐसी कौन सी परिस्थिति हें जिसमें आदमी थोडी देर के लिए मौन और शांति में प्रविष्ट हो सके ? हर परिस्थिति में वह होना चाहे तो बिलकुल हो सकता है।
युनान में एक वजीर को उसके सम्राट ने फांसी की सजा दे दी थी, सुबह तक सब ठीक था। दोपहर वजीर के घर सिपाही आये और उन्होंने घर को चारों तरफ से घेर लिया और वजीर को जाकर खबर दी कि आप कैद कर लिये गये हैं और सम्राट की आज्ञा हैं कि आज शाम 6 बजे आपको फांसी दे दी जायेगी।
वजीर के घर उसके मित्र आये हुए थे, एक बडे भोजन का आयोजन था, वजीर का जन्मदिन था उस दिन एक बडे संगीतज्ञ को बुलाया गया था। वह अभी-अभी अपनी वीणा लेकर हाजिर हुआ था।
अब उसका संगीत शुरू होने को था, संगीतज्ञ के हाथ ढीले पड गये। वीणा उसने एक ओर टिका दी, मित्र उदास हो गये, पत्नी रोने लगी। लेकिन उस वजीर ने कहा 6 बजने में अभी बहुत देर हैं तब तक गीत पूरा हो जायेगा तब तक भोजन भी पूरा हो जायेगा। राजा की बडी कृपा हैं कि 6 बजे तक कम से कम उसने फांसी नही दी।
लेकिन वीणा बंद क्यों हो गई ? भोज बंद क्यों हो गया ? मित्र उदास क्यों हो गये ? छः बज ने में अभी बहुत देर हैं। छः बजे तक कुछ भी बंद करने की कोई जरूरत नहीं लेकिन मित्र कहने लगे अब हम भोजन कैंसे करें ? संगीतज्ञ कहने लगा अब मैं वीणा कैंसे बजाउं ? परिस्थिति बिलकुल अनुकुल नहीं रही।
वह आदमी हंसने लगा जिसको फांसी होने की थी, उसने कहा इससे अनुकुल परिस्थिति और क्या होगी ? छः बजे मैं मर जाउंगा क्या यह उचित होगा कि उससे पहले मैं संगीत सुन लूं, उससे पहले मैं अपने मित्रों के संग हंस लूं , बोल लूं, मिल लूं? क्या यह उचित होगा कि मेरा घर एक उत्सव का स्थान बन जायें, क्योंकि शाम छः बजे मुझे हमेषा को विदा हो जाना है।घर के लोग कहने लगे, परिस्थिति अब अनुकुल रही कि अब कोई वीणा बजायें, परिस्थिति अनुकुल रही कि अब कोई भोजन हो। लेकिन वह आदमी कहने लगा इससे अुनकुल परिस्थिति और क्या होगी? जब छः बजे मुझे हमेशा के लिए विदा हो जाना हैं तो क्या यह उचित होगा कि विदा होते क्षणों में मैं संगीत सुनु , क्या यह उचित होगा कि मित्र उत्सव करें, क्या यह उचित होगा कि मेरा घर एक उत्सव बन जायें, कि जाते क्षण में मेरी स्मृति में वे थोडे से पल टिके रह जायें जो मैंने अंतिम क्षण में विदाई के क्षण में अनुभव किये थे।
और उस घर में वीणा बजती रही और उस घर में भोजन चलता रहा, यदपि लोग उदास थे संगीतज्ञ उदास था लेकिन वह वजीर खुश था वह प्रसन्न था राजा को खबर मिली राजा देखने आया की वह वजीर पागल तो नहीं हैं और जब वह पहूंचा तो घर में वीणा बजती थी मेहमन इकट्ठे थे और राजा जब भीतर गया तो वजीर खुद भी आनन्दमग्न बैठा था |
तो उस राजा ने पुछा तूम पागल हो गये, हो। खबर नहीं मिली कि शाम 6 बजे मौंत तुम्हारी रही है। ? उसने कहा खबर मिल गयी, इसलिए आनन्द के उत्सव को हमने तीव्र कर दिया हैं उसे शिथिल करने का तो सवाल था क्योंकि छः बजे तो मैं विदा हो जोउंगा, तो छः बजे तक आनन्द के उत्सव को हमने तीव्र कर दिया है। क्योंकि यह अंतिम विदा के क्षण स्मरण रह जायें।
राजा ने कहा- ऐसे आदमी को फांसी देना व्यर्थ हैं, जो आदमी जीना जानता है उसे मरने की सजा नहीं दी जा सकती। उसने कहा- सजा मैं वापस ले लेता हूं, ऐस प्यारे आदमी को अपने हाथों से मारूं यह ठीक नहीं,
जीवन में क्या अवसर हैं, क्या परिस्थिति हैं यह इस बात पर निर्भर नहीं होता कि परिस्थिति क्या है ? यह इस बात पर निर्भर होता हैं कि उस परिस्थिति को आप किस भांति लेते हैं ? किस Attitude में किस द्रष्टि से , तो मुझे नहीं लगता कि कोई भी ऐसी परिस्थिति हो सकती हैं जो आपके जीवन में सुख-आनंद की तरफ जाने से आपको रोकती हो  आप ही अपने को रोकना चाहते हो तो बात दूसरी है। तब हर परिस्थिति रोक सकती है। और आपही अपने को रोकना चाहते हो तो कोई ऐसी परिस्थिति कभी थी और कभी हो सकती है।

थोडा ध्यान से अपनी द्रष्टि को देखने की कोशिश करे। परिस्थिति को दोष मत देना थोडा ध्यान करना इस बात पर कि मेरा दृष्टिकोण परिस्थिति को समझने की मेरी वृत्ति, मेरी अप्रोच, मेरी पहूंच तो कही गलत नही है, कहीं मैं गलत ढंग से तो चीजों को नही ले रहा हूं। फिर आप पाएंगे की सुख दुःख सफलता असफलता सब कुछ आपके नजरिये पर निर्भर करती हैं अपनी सोच बदलो, फिर आपको हार में भी जीत दिखेगी, दुःख में भी सुख दिखेगा |

सात अचुक उपाय जो जीवन में हर लक्ष्य तक पहूंचाए

ways to achieve goals
kamyab hone ke tarike janiye life me safal kaise ho – लक्ष्य goal पर वैसे ही निगाह रखें जैंसे अर्जूंन ने मछली की आंख पर रखी थी। लक्ष्य (goal) तक पहूचने के मार्ग में आने वाली बाधाओं के बारे में आंकलन करें।अपने लक्ष्य पर टिके रहे, एसा न हो कि जरा सी मुसीबत आते ही बदल जाये। व्यावहारिक लक्ष्य बनायें, अपनी सीमाओं और क्षमताओं strength  को जरूर आंके। कुछ हासिल करने के लिए मेहनत तो करनी ही पडती है।इसके बिना जीवन में कुछ भी हासिल कर पाना असंभव है।तो आईये जानते हैं सात ऐसे कदम जो आपको अपने लक्ष्य को हासिल करने में मददगार कर सकते है-रहें स्पष्ट, नहीं होगा कष्ट, Be clean with your goals- खुश रहना कोई लक्ष्य नहीे हैं, बल्कि यह जानना जरुरी हैं कि आखिर आपको किस चीज से खुषी होती है। इस बारे में अपना नजरिया साफ रखे। किसी खास बिन्दू पर अपनी नजर रखें। मान लिजिए आप फिटनेस आसिल करना चाहते हैं, लेकिन आपको यह भी मालूम होना चाहिए कि आखिर आपकी नजर में फिटनेस का अर्थ क्या है ? क्या पाच-सात किलो वजन कम करना आपके लिए काफी होगा या आप षारीरिक षक्ति बडाना चाहते है? या किसी खास डेस में फिट आना आपका लक्ष्य है ? या फिर मैराथन के लिए फिट होना आपका लक्ष्य है ? कहने का अर्थ यह हैं कि आपको अपनी ख़ुशी के बारे में सटीक और पिन पांइंट जानकारी होनी चाहिए। चरण तय करें, Make step’s- कुछ सिखने और जानने के लिए हर बार घर बाहर निकलना जरूरी नहीं, इंटरनेट के इस दौर में काफी चीजें घर बैठे ही सीखी जा सकती है। कामयाब लोेगों के बारे में पढें और देखें उन्होनें अपने जीवन में कामयाबी कैसे पाई ?
ऐसे लोगो के बारे में जानकारी हासिल करना जिन्होंने ने जीवन में वह हासिल किया हैं जो आपका लक्ष्य है। इससे आपको चरणबद्ध कामयाबी हासिल करने में मदद मिलेगी। अच्छा रहेगा अगर आप उन पांइंट्स को लिख लें इससे आपको जीवन में अपना लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी।

हे जूनून, Be passionate-

यह बहुत जरूरी है, हम षुरुआत तो बहुत अच्छी करते हेैं लेकिन कुछ ही दिनों में यह जूनून कहीं खो जाता है। हम अपने लक्ष्य से भटक जाते है, हमें अपनी क्षमताओं पर ही संदेह होने लगता है, हमें नाकायाबी का डर सताने लगता है। हमें नकारे जाने और अपना लक्ष्य हासिल न कर पाने का डर सताने लगता है। हम मेहनत के कडके रास्ते के स्थान पर षाॅर्टकट तलाषने लगते है। इससे आपको कामयाबी हासिल नहीं होगी। कामयाबी के लिए जूनून होना बहुत जरूरी है। जब तक लक्ष्य हासिल न हो जाये उसे छोडना सही नहीं है। आपके सवाल है आपकी ताकत- अपने आप से यह सवाल जरुर पुछें। पुछें कि आपके लिए आपके लक्ष्य की क्या किमत है ? क्या आप उसे हासिल किये बिना अपना जीवन पूर्ण मानते है ? यह केवल आपके अहमं को संतुष्ट करने का सवाल नहीं है। यह बात कुछ और है। यह मायने रखता हैं कि आपकी नजरों में आपके सपने कितने मायने रखते है? और उन्हे हासिल करने में आप अपनी मेहनत कर सकते हो, यह खुद से मुलाकात की तरह है। इन सवालों के जवाबों के बिना षायद लक्ष्य का आनंद अधुरा ही रह जाता है।  
देखें आपने क्या सीखा, See what you’ve learned- नतीजें बहुत मायने रखते है, लेकिन इससे ज्यादा मायने रखती हैं वो सिख जो आपको इस पूरे सफर में मिलती है। लक्ष्य हासिल करने के दौरान आप विभिन्न चरणों से गुजरते हैं, और हर चरण आपको कुछ सीखाता है।अगर एक बार आप नाकायाब भी हो जायें तो उन सीखों को कभी न छोडें। यह सीख जीवन भर काम आयेंगी। नकारात्मक विचारों से दूर रहे। संभव हैं कि कईं बार परिणाम आपके पक्ष में नहीं आये, लेकिन इस सफर में आपने जो सीखा हैं वह हमेषा आपके साथ रहेगा।
दृढ रहें, Always be strong-अपने हक पर कायम रहं। अपने हिस्से की कामयाबी और उसका श्रेय किसी दूसरे व्यक्ति को न लेने दे। यह आपका है और आपको पूरी कोषिष करनी चाहिए कि आपसे आपका हक कोई न छीन पाये। आपकों उसे हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देनी चाहिए । 5हो सकता हैं यह इतना आसान न हो लेकिन इस दुनिया में आसानी से कुछ नहीं मिलता । उदाहरण के लिए आप अपने स्वभाव में किसी सकारात्मक बदलाव करना चाहते हैं तो आप अकेले के लिए यह कर पाना मुष्किल होगा। इस पर टिके रहने के लिए आपको कई प्रकार के समझोते करने पड सकते है।विचारों का द्वंद आपकी निंद उडा सकता है। आपको अपने अह्म से समझोता करना पड सकता है। इसके साथ ही आपका अपना दिल माफ करने लायक बडा बनाना होगा। यह अपने आप से की जाने वाली लंबी लडाई हैं जिसे आपको रोजाना लडना होगा।

जो है आपका है, Everything is your’s-

यह पूरी शिक्षा का अर्थ है- जाने जो आपने सिखा है वह आपका है। आपसे वह कोई नहीं छिन सकता, भले ही आपका लक्ष्य न हो लेकिन कईं बार यह आपके लक्ष्य से भी अधिक अहम हो सकता है। आपका यह अनुभव जीवन में बेहतर इंसान बनने में मदद करेगा। यह अनुभव और उससे प्राप्त सीख जीवन में सबसे अधिक मायने रखती है। लक्ष्य हासिल करने का सफर वास्तव में अपनी क्षमताओं और सीमाओं का आंकलन करना है। उन्हे बढाना है। यह अपने भितर यात्रा करने का मौंका देता है। यह दोषारोपण षिकायत और गिला शिकवा नहीं है।नाकामयाबी का कोई बहाना नही होता। लक्ष्य तो जीवन चक्र के साथ चलते रहने का नाम है। अनवरत यात्रा का दूसरा नाम है।

Wednesday, November 23, 2016

भगवान क्रष्ण से द्वारकाधिश – राधा के कुछ कड़वे प्रश्न कृष्ण से |

भगवान क्रष्ण से द्वारकाधिश

Krishna और Radha स्वर्ग में विचरन कर रहें थे, तभी अचानाक दोंनो एक दूसरे के सामने आ गए क्रष्ण तो विचलित हो गए और राधा प्रसन्नचित हो उठी, क्रष्ण सकपकाए और राधा मुस्कुराई.   इससे पहले की क्रष्ण कुछ कहते ईतने राधा बोल उठी.  ‘ कैसे हो द्वारकाधीश ??

जो राधा उंन्है, कान्हा कान्हा कह के बुलाया कर ती थी

उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन क्रष्ण को भितर तक घायल कर गया। फिर भी क्रष्ण ने अपने आपको संभाल ते हुए बोले राधा से, “ मै तो तुम्हारे लिए आज भी वही कान्हा हूँ जो कल था तुम मुझे द्वारकाधीश मत कहो ।
चलो बैठते है, कुछ तुम अपनी सुनाओ और कुछ मै अपनी कहता हूँ । सच कहूँ राधा जब भी तुम्हारी याद आती थी, आंखे आँसुओ से भर आती थी”।
इतने में राधा बोली “मेरे साथ ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ. ना तुम्हारी याद आई. न कोई आंसू बहा। क्यूंकि हम तुम्हैं कभी भुले ही कहाँ थे जो तुम याद आते,
इन आँखों में सदा तुम रहते हो कहीं आँसुओ के साथ निकल न जाओ इसलिए रोते भी नहीं थे। प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया जरा आज इसका आईना देखलो।

छ कडवे सच और प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ आपको ?

  • क्या तुमने कभी सोचा की इस तरक्की में तुम कितना पिछड गए,
  • यमुना के मिठे पानी से जिंदगी शुरु की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुँच गए ?
  • एक ऊंगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्र पर भरोसा कर लिया और दसों ऊंगलिओ पर चलने वाली बांसुरी को भूल गए ?
  • कान्हा जब तुम प्रेम से जुडे थे तो जो ऊंगलि गोवर्धन पर्वत अठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी,
  • प्रेम से अलग होने पर उसी ऊंगली ने क्या क्या रंग दिखाया ?
दर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी, कान्हा और द्वारकाधिश में क्या फर्क होता है बताऊ ?
अगर तुम कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते, सुदामा तुम्हारे घर नही आते ।
युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है,
युद्ध में आप मिटाकर जितते है और प्रेम में आप मिटकर 
जितते हैं ।
कान्हा प्रेम में डुबा हुआ आदमी, दुखी तो रह सकता है पर किसी को दूख: नहीं देता।  
आप तो बहुत सी कलाओं के स्वामी हो, स्वप्न दूर द्रष्टा हो,  गीता जैसे ग्रंथ के दाता हो, पर आपने ये कैसे-कैसे निर्णय किया अपनी पूरि सेना कौरवों को सोंप दी, और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया।
  सत्य की खोज, स्वतंत्र वही हो सकता है, जो स्वंय को जानता हो |Satya ki Khoj hindi story
सेना तो आपकी प्रजा थी राजा तो पालक होता है, उनका रक्षक होता है। आप जैसे महान ज्ञानी उस रथ को चला रहा था, जिस रथ पर अर्जुन बेठा था । आपकी प्रजा को हि मार रहा था, अपनी प्रजा को मरते देख आपमें करुणा नहीं जगी।
क्यों, क्युंकि आप प्रेम से शुन्य हो चुके थे आज धरती पर जाकर देखो अपनी द्वारकाधिश वाली छवि को ढुंढ्ते रह जाओगे, हर घर, हर मंदिर, में मेरे साथ ही खडे नजर आओगे।
कारण हैं। लो
आज भी मै मानती हूँ  की लोग आपकी लिखी हुई गिता के ज्ञान की बातें करते है, उनके महत्व की बात करते है, मगर धरती के लोग युद्ध वाले द्वारकाधिश पर नहीं प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते है, और गीता मे कहीं मेरा नाम भी नही लेकिन गीता के समापन पर राधे राधे करते है”


Friday, September 30, 2016

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ओशो के अनमोल वचन के लिए चित्र परिणाम
ओशो के अनमोल वचन के लिए चित्र परिणाम

ओशो के अनमोल वचन के लिए चित्र परिणाम

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ओशो के अनमोल वचन के लिए चित्र परिणाम
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Thursday, May 5, 2016

मौन

मौन होना सीखो। और कम से कम अपने मित्रों के साथ, अपने प्रेमियों के साथ, अपने परिवार के साथ, यहां अपने सहयात्रियों के साथ, कभी कभार मौन में बैठो। गपशप मत किए चले जाओ, बातचीत मत किए चले जाओ। बात करना बंद करो, और सिर्फ बाहरी ही नहीं--भीतरी बातचीत भी बंद करो। अंतराल बनो। बस बैठ जाओ, कुछ मत करो, एक-दूसरे के लिए उपस्थिति मात्र बन जाओ। और शीघ्र ही तुम संवाद का नया ढंग पा लोगे। और वह सही ढंगहै। 


कभी-कभार मौन में संवाद स्थापित करना प्रारंभ करो। अपने मित्र का हाथ थामे, मौन बैठ जाओ। बस चांद को देखते, चांद को महसूस करो, और तुम दोनों शांति से इसे महसूस करो। और देखना, संवाद घटेगा--सिर्फ संवाद ही नहीं, बल्कि घनिष्ठता घटेगी। तुम्हारे हृदय एक लय में धड़कने लगेंगे। तुम एक ही तरह का अवकाश महसूस करने लगोगे। तुम एक ही तरह का आनंद महसूस करने लगोगे। तुम एक-दूसरे की चेतना पर आच्छादित होने लगोगे। वह घनिष्ठताहै। बिना कुछ कहे तुमने कह दिया, और वहां किसी तरह की गलतफहमी नहीं होगी। 

दुख

यदि तुम पलायन न करो, यदि तुम दुख को मौजूद होने दो, यदि तुम उससे आमना-सामना करने को तैयार हो, यदि तुम किसी तरह से उसे भूल जाने का प्रयास नहीं कर रहे हो, तब तुम अलग ही व्यक्ति हो। दुखहै तो, पर बस तुम्हारे आसपास; यह केंद्र में नहींहै, वह परिधि परहै। दुख के लिए केंद्र पर होना असंभवहै; ऐसा वस्तु का स्वभाव नहींहै। यह हमेशा परिधि परहै और तुम केंद्र पर हो। 


तो जब तुम उसे होने देते हो, तुम पलायन नहीं करते, तुम भागते नहीं, तुम भयग"स्त नहीं होते, अचानक तुम इस बात के प्रति सजग होते हो कि दुख परिधि परहै जैसे कि कहीं और घट रहाहै, न कि तुम्हारे साथ, और तुम उसे देख रहे हो। तुम्हारे सारे अंतरतम पर एक सूक्ष्म आनंद फैल जाताहै क्योंकि तुमने जीवन का एक मौलिक सत्य पहचान लिया कि तुम आनंद हो, न कि दुख। 


क्रोध

जब तुम किसी के लिए क्रोधित हो और तुम अपना क्रोध उस पर डालते हो, तुम प्रतिक्रिया की चेन पैदा करते हो। अब वह क्रोधित होगा। यह हो सकता है कि जन्मों तक चलता रहे और तुम दुश्मन बने रह सकते हो। तुम इसका अंत कैसे कर सकते हो? यहां सिर्फ एक ही संभावना है। तुम इसका सिर्फ ध्यान में अंत कर सकते हो, और कहीं नहीं, क्योंकि ध्यान में तुम किसी पर क्रोधित नहीं हो । तुम बस क्रोधित हो। 


भेद बुनियादी है। तुम किसी के ऊपर क्रोधित नहीं हो। तुम बस क्रोधित हो और क्रोध ब्रह्मांड में मुक्त होता है। तुम किसी के लिए नफरत से नहीं भरे हो, तुम बस नफरत से भरे हो और वह बाहर फेंक रहे हो। ध्यान में, भावनाएं किसी के लिए नहीं है। वे किसी के लिए नहीं है। वे ब्रह्मांड में चली जाती है, और ब्रह्मांड हर चीज को शुद्ध कर देता है।

यह ऐसे ही जैसे कि गंदी नदी समुद्र में गिरती है : समुद्र उसे शुद्ध कर देगा। जब कभी तुम्हारा क्रोध, तुम्हारी नफरत, तुम्हारी कामुकता, ब्रह्मांड में जाती है, समुद्र में जाती है--यह शुद्ध हो जाती है। यदि गंदी नदी किसी दूसरी नदी में गिरती है, तब दूसरी नदी भी गंदी हो जाती है। जब तुम किसी के ऊपर क्रोधित हो, तुम अपने कचरे को उस पर फेंक रहे हो। तब वह अपना कचरा तुम्हारे ऊपर फेंकेगा और तुम कचरा फेंकने की संयुक्त प्रक्रिया हो जाओगे ।

ध्यान तुम स्वयं को ब्रह्मांड में शुद्ध होने के लिए फेंक रहे हो। सारी ऊर्जा जो तुम ब्रह्मांड में फेंकते हो वह शुद्ध हो जाती है। ब्रह्मांड बहुत विशाल है महान समुद्र, तुम उसे गंदा नहीं कर सकते। ध्यान में हम किसी व्यक्ति से नहीं जुड़े हैं। ध्यान में हम सीधे ब्रह्मांड से जुड़ते हैं।

तादात्म्य नहीं

इसे अपनी कुंजी बन जाने दो--अगली बार जब क्रोध आए, बस उसे देखो। मत कहो, "मैं क्रोधित हूं।' कहा, "क्रोध यहां है और मैं उसका दृष्टा हूं।' और फर्क देखना! फर्क बहुत बड़ा होगा। अचानक तुम क्रोध की पकड़ से बाहर हो गए। यदि तुम कह सको, "मैं बस देखने वाला हूं, मैं क्रोध नहीं हूं,' तुम उसकी पकड़ से बाहर हो गए। जब उदासी आए, बस एक तरफ बैठ जाओ और कहो, "मैं देखने वाला हूं, मैं उदासी नहीं हूं,' और फर्क देखना। तत्काल तुमने उदासी की जड़ काट दी। वह और अधिक पोषित नहीं हो रही। वह भूख से मर जाएगी। हम इन विभिन्न भावनाओं से तादात्म्य बना कर पोषित करते हैं।

यदि धार्मिकता को एक अकेली बात में सिकोड़ा जा सके, तो वह है तादात्म्य का न होना। 

तुलना

तुलना रुग्णता है, बहुत बड़ी रुग्णता है। प्रारंभ से ही हमें तुलना करना सिखाया जाता है। तुम्हारी मां तुम्हारी तुलना दूसरे बच्चों से करने लगती है। तुम्हारे पिता तुलना करते हैं। शिक्षक कहते हैं, "गोपाल को देखो, वह कितना अच्छा है, और तुम कुछ भी ठीक नहीं रहे हो!' 


शुरुआत से ही तुम्हें कहा गया है कि स्वयं की तुलना दूसरों से करो। यह बड़ी से बड़ी रुग्णता है; यह कैंसर की तरह है जो तुम्हारी आत्मा को नष्ट किए चला जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है, और तुलना संभव नहीं है। मैं बस मैं हूं और तुम बस तुम। दुनिया में कोई नहीं है जिसके साथ तुलना की जाए। क्या तुम गेंदे की तुलना गुलाब से करते हो? तुम तुलना नहीं करते। क्या तुम आम की तुलना सेव फल से करते हो? तुम तुलना नहीं करते। तुम जानते हो कि वे असमान हैं--तुलना संभव नहीं है।

मनुष्य कोई वर्ण नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है। तुम्हारे जैसा व्यक्ति पहले कभी नहीं हुआ और फिर से कभी नहीं होगा। तुम पूरी तरह से अद्वितीय हो। यह तुम्हारा विशेषाधिकार है, तुम्हारा खास हक है, जीवन का आशीर्वाद है--कि इसने तुम्हें अद्वितीय बनाया। 

सुनना

यदि तुम सब तरह के पूर्वाग्रहों के साथ सुन रहे हो तो यह सुनने का गलत ढंग है। तुम्हें लगता है कि सुन रहे हो, पर तुम्हें बस सुनाई दे रहा है, तुम सुन नहीं कर रहे। सही सुनने का मतलब होता है मन को एक तरफ रख देना। इसका यह मतलब नहीं होता कि तुम बुद्धू हो जाते हो, कि जो कुछ भी तुम्हें कहा जा रहा है उस पर तुम विश्वास करने लगते हो। इसका विश्वास या अविश्वास से कुछ लेना-देना नहीं है। सही सुनने का मतलब है, "अभी मेरा इससे कुछ लेना-देना नहीं है कि इस पर मैं विश्वास करूं या ना करूं। इस क्षण राजी होने या ना राजी होने की कोई बात ही नहीं है। जो कुछ भी है उसे सुनने का मैं प्रयास कर रहा हूं। बाद में मैं तय कर सकता हूं कि क्या सही और क्या गलत है। बाद में मैं तय कर सकता हूं कि अनुसरण करना है या अनुसरण नहीं करना है।' 


और सही सुनने की सुंदरता यह है कि सत्य का अपना संगीत होता है। यदि तुम बिना पूर्वाग्रह के सुन सको, तुम्हारा हृदय कहेगा कि यह सत्य है। यदि वह सत्य है तो तुम्हारे हृदय में घंटियां बजने लगती हैं । यदि वह सत्य नहीं है, तुम अछूते बने रहोगे, उदासीन, विरक्त बने रहोगे; तुम्हारे हृदय में कोई घंटियां नहीं बजेंगी, कोई समस्वरता नहीं घटती। यह सत्य का गुण है कि यदि तुम उसे खुले हृदय से सुनो, यह तत्काल तुम्हारी चेतना में प्रतिसाद पैदा करता है--तुम्हारा केंद्र ऊपर उठने लगता है। तुम्हारे पंख उगने लगते हैं; अचानक सारा आकाश खुल जाता है।

यह बात तार्किक ढंग से तय करने की नहीं है कि जो कहा जा रहा है वह सत्य है या असत्य है। ठीक इससे उल्टा, यह सवाल तो प्रेम का है, न कि तर्क का। सत्य तत्काल तुम्हारे हृदय में प्रेम पैदा करता है; तुम्हारे अंदर बड़े रहस्यात्मक ढंग से कुछ छिड़ जाता है।

लेकिन यदि तुम जो है उसे गलत ढंग से सुनते हो, मन से पूरे भरे हुए, तुम्हारे सारे कचरे से भरे, तुम्हारी सारी जानकारी से भरे हुए--तब तुम अपने हृदय को सत्य का प्रतिसंवेदन नहीं करने दोगे। तुम बहुत बड़ी संभावना से चूक जाओगे, तुम समस्वरता को चूक जाओगे। तुम्हारा हृदय सत्य के अनुकूल होने को तैयार था...वह सिर्फ सत्य के अनुकूल होता है, इसे याद रखो, यह कभी भी असत्य को प्रतिसंवेदित नहीं करता। असत्य के साथ यह पूरा मौन रहता है, बिना जवाब दिए, निर्विकार, बिना हिले बना रहता है। सत्य के साथ यह नाचने लगता है, यह गाने लगता है, ऐसे जैसे कि अचानक सूरज उग गया और काली अंधेरी रात समाप्त हो गई, और तब पक्षी गाने लगते हैं और कमल खिलने लगते हैं, और सारी धरती जाग जाती है। 

साहस

साहस



प्रारंभ में साहसी और डरपोक मेंे फर्क नहीं होता है। दोनो में भय होता है। भेद यह है कि डरपोक अपने भय की सुनता है और उसका अनुसरण करता है। साहसी व्यक्ति उन्हें एक तरफ रख देता है और आगे बढ़ता है। भय तो है, वह उन्हें जानता है, लेकिन साहसी सभी भयों के बावजूद अज्ञात में जाता है। साहसी का मतलब यह नहीं होता है कि वह भयमुक्त होता है, बल्कि सभी भयों के बावजूद अज्ञात जाने वाला होता है।

जब तुम समुद्र में बगैर नकशे के जाते हो, जैसे कि कोलंबस ने किया... भय होता है, बहुत भय होता है, क्योंकि तुम्हें नहीं पता कि क्या होने वाला है और तुम सुरक्षा का किनारा छोड़ रहे हो। एक तरह से तुम पूरी तरह से ठीक थे; सिर्फ एक ही बात चूक रही थी--रोमांच। अज्ञात में जाना तुम्हें रोमांचित करता है। हृदय धड़कने लगता है; तुम फिर से जीवंत हो जाते हो, पूरी तरह से जीवंत। तुम्हारे होने का प्रत्येक रेशा जीवंत हो जाता है क्योंकि तुमने अज्ञात की चुनौती को स्वीकारा।

अज्ञात की चुनौती को स्वीकारना साहस है। भय है, लेकिन यदि तुम बार-बार चुनाती को स्वीकारते रहते हो, धीरे-धीरे वे भय तिरोहित हो जाएंगे। अज्ञात जो आनंद लाता है, अज्ञात के साथ जो महान उ"ास घटने लगता है, वह तुम्हें समग" बनाता है, बहुत अखंडता देता है, तुम्हारी बुद्धिमत्ता को तीक्ष्ण बनाता है। तुम्हें लगने लगता है कि जीवन सिर्फ ऊब ही नहीं है, जीवन रोमांच है। धीरे-धीरे भय तिरोहित होने लगते हैं और तुम नए रोमांच खोजने और ढूंढ़ने लगते हो।

अज्ञात के लिए ज्ञात को, अपरिचित के लिए परिचित को, असुविधाजनक के लिए सुविधानजक को, दुष्कर यात्रा के लिए दांव पर लगा देना साहस है। तुम नहीं जानते कि तुम यह कर पाओगे या नहीं। यह जुंआ है, लेकिन सिर्फ जुंआरी जानते हैं कि जीवन क्या होता है। 

एकांत और अकेलापन


जब भी एकांत होता है, तो हम अकेलेपन को एकांत समझ लेते हैं। और तब हम तत्काल अपने अकेलेपन को भरने के लिए कोई उपाय कर लेते हैं। पिक्चर देखने चले जाते हैं, कि रेडियो खोल लेते हैं, कि अखबार पढ़ने लगते हैं। कुछ नहीं सूझता, तो सो जाते हैं, सपने देखने लगते हैं। मगर अपने अकेलेपन को जल्दी से भर लेते हैं। ध्यान रहे, अकेलापन सदा उदासी लाता है, एकांत आनंद लाता है। वे उनके लक्षण हैं। अगर आप घड़ीभर एकांत में रह जाएं, तो आपका रोआं-रोआं आनंद की पुलक से भर जाएगा। और आप घड़ी भर अकेलेपन में रह जाएं, तो आपका रोआं-रोआं थका और उदास, और कुम्हलाए हुए पत्तों की तरह आप झुक जाएंगे। अकेलेपन में उदासी पकड़ती है, क्योंकि अकेलेपन में दूसरों की याद आती है। और एकांत में आनंद आ जाता है, क्योंकि एकांत में प्रभु से मिलन होता है। वही आनंद है, और कोई आनंद नहीं है।
गीता दर्शन अध्याय ६ प्रवचन 5

Thursday, April 7, 2016

होशपूर्वक खाना और पीना



भोजन करते हुए या पानी पीते हुए भोजन या पानी का स्वाद ही बन जाओ, और उससे भर जाओ। हम खाते रहते हैं, हम खाए बगैर नहीं रह सकते। लेकिन हम बहुत बेहोशी में भोजन करते हैं-यंत्रवत। और अगर स्वाद न लिया जाए तो तुम सिर्फ पेट को भर रहे हो। तो धीरे-धीरे भोजन करो, स्वाद लेकर करो और स्वाद के प्रति सजग रहो। और स्वाद के प्रति सजग होने के लिए धीरे-धीरे भोजन करना बहुत जरूरी है।
तुम भोजन को बस निगलते मत जाओ। आहिस्ते-आहिस्ते उसका स्वाद लो और स्वाद ही बन जाओ। जब तुम मिठास अनुभव करो तो मिठास ही बन जाओ। और तब वह मिठास सिर्फ मुंह में नहीं, सिर्फ जीभ में नहीं, पूरे शरीर में अनुभव की जा सकती है। वह सचमुच पूरे शरीर पर फैल जाएगी। तुम्हें लगेगा कि मिठास-या कोई भी चीज-लहर की तरह फैलती जा रही है। इसलिए तुम जो कुछ खाओ, उसे स्वाद लेकर खाओ और स्वाद ही बन जाओ।
तंत्र कहता है कि जितना स्वाद ले सको उतना स्वाद लो। ज्यादा से ज्यादा संवेदनशील बनो, जीवंत बनो। इतना ही नहीं कि संवेदनशील बनो, स्वाद ही बन जाओ। अस्वाद से तुम्हारी इंद्रियां मर जाएंगी, उनकी संवेदनशीलता जाती रहेगी। और संवेदनशीलता के मिटने से तुम अपने शरीर को, अपने भावों को अनुभव करने में असमर्थ हो जाओगे। और तब फिर तुम अपने सिर में केंद्रित होकर रह जाओगे।
पानी पीते हुए पानी का ठंडापन अनुभव करो। आंखें बंद कर लो, धीरे-धीरे पानी पीओ और उसका स्वाद लो। पानी की शीतलता को महसूस करो और महसूस करो कि तुम शीतलता ही बन गए हो। जब तुम पानी पीते हो तो पानी की शीतलता तुममें प्रवेश करती है, तुम्हारा अंग बन जाती है। तुम्हारा मुंह शीतलता को छूता है, तुम्हारी जीभ उसे छूती है और ऐसे वह तुम में प्रविष्ट हो जाती है। उसे तुम्हारे पूरे शरीर में प्रविष्ट होने दो। उसकी लहरों को फैलने दो और तुम अपने पूरे शरीर में यह शीतलता महसूस करोगे। इस भांति तुम्हारी संवेदनशीलता बढ़ेगी, विकसित होगी और तुम ज्यादा जीवंत, ज्यादा भरे-पूरे हो जाओगे।

Friday, April 1, 2016

खेलपूर्ण होना

खेलपूर्ण होना

गंभीरता बीमारी है, यह उपाय नहीं है। यह मृत्यु तक ले जाती है, न कि अनंत जीवन तक। जीवन खेलपूर्णता, मजा है, क्योंकि सारा अस्तित्व एक विशाल सर्कस है। यह सब आमोद-प्रमोद है--रंग-बिरंगे फूल, इतने सारे सुंदर जानवर, पक्षी, बादल, और बिना किसी प्रयोजन के; उनके होने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है। जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है। जीवन स्वयं में खेल है। यह अनंत ऊर्जा है, अतिप्रवाहित ऊर्जा--अस्तित्व फैलता चला जाता है। किसी परमात्मा ने इसे नहीं बनाया है, क्योंकि जहां कहीं किसी चीज का निर्माण होता है उसका प्रयोजन होता है। जहां कभी कुछ भी किसी कारण से बनाया जाता है, और जब कोई बनाता है, बनायी गई चीज और कुछ नहीं बस मशीन ही होगी। अस्तित्व का ऐसा कोई उपयोग नहीं है, यह अनंत तक बना रहता है, ऊर्जा के अनेकानेक रूपों को अनंत खेल। 

मस्ती बहुत ही पावन शब्द है, प्रार्थना से अधिक पावन। यह एक मात्र शब्द है जो तुम्हें खेलपूर्ण होने का भाव देता है, जो तुम्हें फिर से बच्चा बना देता है। तुम फिर से तितलियों के पीछे भागने लगते हो, समुद्र किनारे सीपियां, रंगीन पत्थर बीनते हो। 

WHAT IS JEALOUSY AND WHY DOES IT HURT SO MUCH?


What is jealousy and why does it hurt so much?

Jealousy is comparison. And we have been taught to compare, we have been conditioned to compare, always compare. Somebody else has a better house, somebody else has a more beautiful body, somebody else has more money, somebody else has a more charismatic personality. Compare, go on comparing yourself with everybody else you pass by, and great jealousy will be the outcome; it is the by-product of the conditioning for comparison.
Otherwise, if you drop comparing, jealousy disappears. Then you simply know you are you, and you are nobody else, and there is no need. It is good that you don’t compare yourself with trees, otherwise you will start feeling very jealous: why are you not green? And why has existence been so hard on you – and no flowers? It is better that you don’t compare with birds, with rivers, with mountains; otherwise you will suffer. You only compare with human beings, because you have been conditioned to compare only with human beings; you don’t compare with peacocks and with parrots. Otherwise, your jealousy would be more and more: you would be so burdened by jealousy that you would not be able to live at all.
Comparison is a very foolish attitude, because each person is unique and incomparable. Once this understanding settles in you, jealousy disappears. Each is unique and incomparable. You are just yourself: nobody has ever been like you, and nobody will ever be like you. And you need not be like anybody else, either.
Existence creates only originals; it does not believe in carbon copies.
A bunch of chickens were in the yard when a football flew over the fence and landed in their midst. A rooster waddled over, studied it, then said, “I’m not complaining, girls, but look at the work they are turning out next door.”
Next door great things are happening: the grass is greener, the roses are rosier. Everybody seems to be so happy – except yourself. You are continuously comparing. And the same is the case with the others, they are comparing too. Maybe they think the grass in your lawn is greener – it always looks greener from the distance – that you have a more beautiful wife.... You are tired, you cannot believe why you allowed yourself to be trapped by this woman, you don’t know how to get rid of her – and the neighbor may be jealous of you, that you have such a beautiful wife! And you may be jealous of him....
Everybody is jealous of everybody else. And out of jealousy we create such hell, and out of jealousy we become very mean.
An elderly farmer was moodily regarding the ravages of the flood. “Hiram!” yelled a neighbor, “your pigs were all washed down the creek.”
“How about Thompson’s pigs?” asked the farmer.
“They’re gone too.”
“And Larsen’s?”
“Yes.”
“Humph!” ejaculated the farmer, cheering up. “It ain’t as bad as I thought.”
If everybody is in misery, it feels good; if everybody is losing, it feels good. If everybody is happy and succeeding, it tastes very bitter.
But why does the idea of the other enter in your head in the first place? Again let me remind you: because you have not allowed your own juices to flow; you have not allowed your own blissfulness to grow, you have not allowed your own being to bloom. Hence you feel empty inside, and you look at each and everybody’s outside because only the outside can be seen.
You know your inside, and you know the others’ outside: that creates jealousy. They know your outside, and they know their inside: that creates jealousy. Nobody else knows your inside. There you know you are nothing, worthless. And the others on the outside look so smiling. Their smiles may be phony, but how can you know that they are phony? Maybe their hearts are also smiling. You know your smile is phony, because your heart is not smiling at all, it may be crying and weeping.
You know your interiority, and only you know it, nobody else. And you know everybody’s exterior, and their exterior people have made beautiful. Exteriors are showpieces and they are very deceptive.
There is an ancient Sufi story:
A man was very much burdened by his suffering. He used to pray every day to God, “Why me? Everybody seems to be so happy, why am only I in such suffering?” One day, out of great desperation, he prayed to God, “You can give me anybody else’s suffering and I am ready to accept it. But take mine, I cannot bear it any more.”
That night he had a beautiful dream ÿ beautiful and very revealing. He had a dream that night that God appeared in the sky and he said to everybody, “Bring all your sufferings into the temple.” Everybody was tired of his suffering – in fact everybody has prayed some time or other, “I am ready to accept anybody else’s suffering, but take mine away; this is too much, it is unbearable.”
So everybody gathered his own sufferings into bags, and they reached the temple, and they were looking very happy; the day has come, their prayer has been heard. And this man also rushed to the temple.
And then God said, “Put your bags by the walls.” All the bags were put by the walls, and then God declared: “Now you can choose. Anybody can take any bag.”
And the most surprising thing was this: that this man who had been praying always, rushed towards his bag before anybody else could choose it! But he was in for a surprise, because everybody rushed to his own bag, and everybody was happy to choose it again. What was the matter? For the first time, everybody had seen others’ miseries, others’ sufferings – their bags were as big, or even bigger!
And the second problem was, one had become accustomed to one’s own sufferings. Now to choose somebody else’s – who knows what kind of sufferings will be inside the bag? Why bother? At least you are familiar with your own sufferings, and you have become accustomed to them, and they are tolerable. For so many years you have tolerated them – why choose the unknown?
And everybody went home happy. Nothing had changed, they were bringing the same suffering back, but everybody was happy and smiling and joyous that he could get his own bag back.
In the morning he prayed to God and he said, “Thank you for the dream; I will never ask again. Whatsoever you have given me is good for me, must be good for me; that’s why you have given it to me.”
Because of jealousy you are in constant suffering; you become mean to others. And because of jealousy you start becoming phony, because you start pretending. You start pretending things that you don’t have, you start pretending things which you can’t have, which are not natural to you. You become more and more artificial. Imitating others, competing with others, what else can you do? If somebody has something and you don’t have it, and you don’t have a natural possibility of having it, the only way is to have some cheap substitute for it.
I hear that Jim and Nancy Smith had a great time in Europe this summer. It’s so great when a couple finally gets a chance to really live it up. They went everywhere and did everything. Paris, Rome... you name it, they saw it and they did it.
But it was so embarrassing coming back home and going through customs. You know how custom officers pry into all your personal belongings. They opened up a bag and took out three wigs, silk underwear, perfume, hair coloring...really embarrassing. And that was just Jim’s bag!
Just look inside your bag and you will find so many artificial, phony, pseudo things – for what? Why can’t you be natural and spontaneous? – because of jealousy.
The jealous man lives in hell. Drop comparing and jealousy disappears, meanness disappears, phoniness disappears. But you can drop it only if you start growing your inner treasures; there is no other way.
Grow up, become a more and more authentic individual. Love yourself and respect yourself the way existence has made you, and then immediately the doors of heaven open for you. They were always open, you had simply not looked at them.
osho

संकट के समय का उपयोग करना


संकट के समय का उपयोग करना

मैं इतनी उलझन महसूस कर रहा हूं। क्या अच्छा, क्या बुरा, कुछ समझ में नहीं आता।
जब भी इस तरह पहचान का संकट उत्पन्न हो जाए,  जब भी व्यक्ति जान न पाए कि वह कौन है, जब भी अतीत की पकड़ ढीली पड़ जाए, जब भी व्यक्ति की परंपरागत जड़ें उखड़ जाएं, जब अतीत प्रासंगिक न रह जाए, यह संकट उत्पन्न हो, पहचान का महा संकट - हम कौन हैं? हमें क्या करना चाहिए?
यह सौभाग्य का अवसर अभिशाप में भी बदल सकता है, यदि दुर्भाग्य से तुम किसी एडोल्फ हिटलर के हाथ पड़ गए, लेकिन यही अभिशाप अज्ञात के महान द्वार भी खोल सकता है, यदि तुम भाग्यशाली रहे कि तुम्हें किसी बुद्ध के आसपास रहने का अवसर मिल जाए। यदि तुम भाग्यशाली रहे कि तुम किसी बुद्ध के प्रेम में पड़ सके तो तुम्हारा जीवन रुपांतरित हो सकता है।
जो लोग अभी भी परंपरा के जाल में उलझे हैं, और समझते हैं कि वे जानते हैं कि सही क्या है और गलत क्या है, वे कभी भी बुद्ध के पास नहीं आ पाएंगे। वे अपने ढंग से जीना जारी रखेंगे - सामान्य, सुस्त और मरा-मरा सा जीवन। वे अपना रोजमर्रा का काम करने में ही अपना जीवन बिता देंगे जैसा उनके पूर्वज करते रहे हैं। सदियों से वे एक घिसी-पिटी लकीर पर चलते रहें हैं और वे उसी सड़ी हुई लकीर पर चलते रहेंगे।
वास्तव में जब तुम किसी पुरानी घिसी-पिटी लकीर पर चलते हो, तुम निश्चिन्त महसूस करते हो - कि इस रास्ते पर बहुत लोग चल चुके हैं। लेकिन जब किसी बुद्ध के पास आते हो और अज्ञात में यात्रा शुरू करते हो, वहां कोई राजपथ नहीं होता, कोई पिटी-पिटाई लकीर नहीं होती। तुम्हें चल कर अपना पथ स्वयं निर्मित करना होता है; कोई पूर्व-निर्मित पथ नहीं पाया जा सकता।
 मैं तुम्हें तुम्हारी ही तरह चलने के लिए प्रोत्साहन दे सकता हूं, तुम्हारे भीतर खोज की एक प्रक्रिया को तेज़ कर सकता हूं, परंतु मैं तुम्हें कोई विचार की विधि नहीं दूंगा, मैं तुम्हें कोई आश्वासन नहीं दूंगा। मैं तुम्हें एक तीर्थ-यात्रा का निमंत्रण... एक तीर्थ-यात्रा जो अत्यंत खतरनाक है, एक तीर्थ-यात्रा जिसमें लाखों तरह के नुकसान की संभावनाएं हैं, एक तीर्थ-यात्रा जहां तुम्हें दिन-प्रतिदिन अधिक से अधिक खतरों का सामना करना पड़ेगा, एक तीर्थ-यात्रा जो तुम्हें मनुष्य-चेतना के उच्चतम शिखर, तुरीय-अवस्था तक ले जाएगी। लेकिन तुम जितनी ऊंचाई पर चढ़ते हो, उतना ही नीचे गिरने का खतरा भी बना रहता है।
मै तुम्हें एक महत साहसिक कार्य का वचन भर दे सकता हूं, जो अधिक संकटपूर्ण और खतरनाक है। परंतु तुम इसे पा सकोगे - इसका कोई वचन नहीं देता - क्योंकि अज्ञात के लिए कोई गारंटी नहीं दी जा सकती है।
यह एक सुंदर स्पेस है जिसमें तुम प्रवेश कर रहे हो। यदि तुम्हारे भीतर अच्छे और बुरे का अस्तित्व समाप्त हो जाए तो यह अति सुंदर है। अब दूसरे आयाम में प्रवेश करो, जो मनुष्य-निर्मित नहीं है, जहां भेद की कोई प्रासंगिकता नहीं रह जाती, जहां कुछ भी अच्छा और कुछ भी बुरा नहीं है, जहां जो भी है, बस है, और जो नहीं है, नहीं है। अच्छे और बुरे का कोई सवाल नहीं है; या तो कुछ है या कुछ नहीं है। अच्छा और बुरा कुछ नहीं हैं, वे चुने जाने के विकल्प मात्र हैं: यह चुनो या वह चुनो। वे तुम्हें ' यह' या 'वह' के चुनाव में उलझाए रखते हैं।
जिस क्षण तुम अच्छे और बुरे की आपा-धापी को देखना शुरु करते हो, जब तुम देखने लगते हो कि ये मात्र समाज-निर्मित चीजें हैं...वास्तव में वे उपयोग में लाई जाने वाली चीजें हैं, और मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम बाजार जाओ और ऐसे व्यवहार करो कि वहां कुछ भी अच्छा और बुरा नहीं है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम सड़क के बीच में चलने लगो, यह कहते हुए कि इससे क्या फर्क पड़ता है कि कोई बांए चले या दांए।
जब तुम लोगों के साथ हो, याद रखो, उनके लिए अच्छा और बुरा अब भी मायने रखता है। उनके और उनके सपने के प्रति आदर का भाव रखो। तुम्हारे लिए यह उचित नहीं है कि तुम किसी के सपने में बाधा डालो। तुम कौन होते हो? तुम्हें किसी को बाधा नहीं देनी है। लोगों और उनकी मूढ़ताओं के प्रति विनम्र रहो, उनके और उनके मूढ़ खेल के प्रति विनम्र रहो। परंतु हर पल भीतर गहरे में याद रखो कि कुछ भी अच्छा नहीं है, कुछ भी बुरा नहीं है।
अस्तित्व मात्र है, बीच में कुछ भी चुनना नहीं है। और याद रखो, जब बीच में कुछ भी चुनना नहीं है, तुम अविभक्त हो जाओगे। जब कुछ बीच में चुनने को हो, वह तुम्हें भी विभक्त कर देता है। विभाजन दुधारी तलवार जैसी है: बाहर यह वास्तविकता को बांट देती है, भीतर यह तुम्हें बांट देती है। यदि तुम किसी प्रकार का चुनाव करते हो, तुम विभाजित होना चुन लेते हो, तुम बंट जाना चुन लेते हो, तुम एक प्रकार का पागलपन चुन लेते हो। यदि तुम कोई चुनाव नहीं करते हो, यदि तुम जानते हो कि कुछ भी अच्छा नहीं है, कुछ भी बुरा नहीं है तो तुमने मानसिक स्वास्थ्य चुना।
कुछ भी चुनाव न करना, मानसिक स्वास्थ्य को चुनना है, चुनाव न करना स्वस्थ होना है, क्योंकि अब बाहर कोई विभाजन नहीं है, तब तुम भीतर विभाजित कैसे हो सकते हो? भीतर और बाहर एक साथ संचालित होते हैं। तुम अविभाज्य हुए, अब तुम एक व्यक्ति हुए। यह एक व्यक्तित्व प्रदान करने की प्रक्रिया है। कुछ भी अच्छा नहीं है, कुछ भी बुरा नहीं है: जब तुम्हारी चेतना में इसका उदय होता है, अचानक तुम एक साथ होते हो, सभी टुकड़े एक जोड़ में विलीन हो जाते हैं। तुम सघन हो जाते हो, तुम केंद्रित हो जाते हो।
यह जानना कि कुछ न अच्छा है, न कुछ बुरा है, एक टर्निंग प्वाइंट है, परिवर्तन का बिंदु है; यह एक रूपांतरण है। तुम अंदर देखने लगते हो, बाहर की वास्तविकता मूल्यहीन लगने लगती है। सामाजिक वास्तविकता एक कल्पना है, एक सुंदर नाटक है; तुम इसमें भाग ले सकते हो, परंतु तब तुम इसे गंभीरता से नहीं लेते हो। यह तुम्हारे लिए एक भूमिका मात्र है जिसे तुम अदा कर रहे हो, इसे जितनी सुंदरता से, जितनी दक्षता से निभा सकते हो, निभाओ। परंतु इसे गंभीरता से मत लो, इसमें कुछ भी अंतिम नहीं है।
अंतिम तुम्हारे भीतर है; वैयक्तिक चेतना इसे जानती है। और उस चेतना तक आने के लिए, यह एक अच्छा टर्निंग प्वाइंट है।

बस “हां” कहो



बस “हां” कहो

जीवन को नकार से नहीं जिया जा सकता, और जो जीवन को नकार से जीने का प्रयत्न करते हैं वे जीवन को केवल गंवा देते हैं। आप नकार को अपना आशियाना नहीं बना सकते क्योंकि नकार पूरी तरह खाली है। नकार अंधेरे की तरह है। अंधेरे का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं होता; यह केवल प्रकाश की अनुपस्थिति है। इसलिए आप सीधे-सीधे अंधेरे के साथ कुछ नहीं कर सकते। आप इसे कमरे से बाहर धकेल नहीं सकते, आप इसे पड़ोसी के घर में नहीं फेंक सकते; और आप अपने घर में और अधिक अंधेरा नहीं ला सकते। अंधेरे के साथ सीधे कुछ नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह नहीं है। यदि आप अंधेरे के साथ कुछ करना चाहते हैं, तो प्रकाश को बुझा दें; यदि आप अंधेरा नहीं चाहते, प्रकाश को जला दें। लेकिन जो कुछ भी आपको करना है वह प्रकाश के साथ करना है।'
' ठीक उसी तरह, हां प्रकाश है, नकार अंधेरा है। यदि आप अपने जीवन में वास्तव मेम कुछ करना चाहते हैं, आप को हां कहना सीखना पड़ेगा। और हां कहना अत्यधिक सुंदर है; मात्र हां कहना अधिक शिथिल करने वाला है। इसे सहजतापूर्वक अपनी जीवन शैली बना लो। वृक्षों से, पक्षियों से और लोगों से हां कहना शुरु करो, और तुम आश्चर्य चकित हो जाओगे: जीवन एक आशीर्वाद हो जाएगा यदि तुम इसे हां कहने लगो। जीवन एक महान साहसिक कृत्य हो जएगा।
जोरबा दि बुद्धा  
विधि:
समय: प्रत्येक रात्रि, सोने से पहले, कम से कमे 10 मिनिट ; फिर सुबह सबसे पहले कम से कम 3 मिनिट। दिन में भी, जब भी आप नकारात्मक महसूस करें, अपने बिस्तर पर बैठ जाएं और इसे करें।
पहला चरण: हां  में अपनी ऊर्जा लगना शुरु करें, हां को एक मंत्र बनालें। अपने बिस्तर पर बैठे हुए, हां... हां... दुहराना शुरु करें। इसए साथ एक धुन में हो जाएं। पहले आप इसे दुहरा रहेम होगे फिर इसके साथ लयबद्ध हो जाएं, इसके साथ झूमें।  इसे सिर से पांव तक अपने पूरे अस्तित्व को आच्छादित करने दें। इसे गहराई तक अपने में प्रवेश करने दें।
दूसरा चरण: यदि इसे जोर से नहीं कह सकते, तो धीमे से हां...हां...हां दुहराएं!