Friday, February 19, 2016

क्षणभंगुर का आकर्षण

अगर तुम सिर्फ ज्ञान में ही उलझ गए, तो कोरे रेगिस्तान की भांति हो जाओगे–साफ-सुथरे, पर कुछ भी ऊगेगा नहीं; स्वच्छ, पर निर्बीज; विस्तीर्ण, पर न तो कोई ऊंचाई, न कोई गहराई। ज्ञान शुष्क है, अकेला। और अगर तुम अकेले भक्त हो गए, तो तुम्हारे जीवन में वृक्ष तो उगेंगे, फूल तो फलेंगे, हरियाली होगी, लेकिन उस हरियाली को बचाने के तुम्हारे पास उपाय न होंगे। तुम उन पौधों की रक्षा न कर पाओगे। अगर कोई संदेह जगाने आ गया, तो तुम्हारी उर्वर भूमि में संदेह के बीज भी पड़ जाएंगे, उनमें भी अंकुर आ जाएंगे।
भक्त अगर ज्ञान की प्रक्रिया से न गुजरा हो, तो उसका भवन सदा डगमगाता रहेगा। कोई भी संदेह डाल सकता है। और भक्त तो विश्वास करना जानता है। वह उन पर भी विश्वास कर लेता है जो उसे ले जा रहे हैं; वह उन पर भी विश्वास कर लेता है जो उसे भटका रहे हैं। वह गलत को भी पकड़ लेता है उसी तरह, जिस तरह ठीक को पकड़ता है। उसके पास सोचने-समझने की क्षमता नहीं; उसके पास विवेक नहीं।
तो भक्त ऐसे है, जैसे अंधा हो; ज्ञान ऐसे है, जैसे लंगड़ा हो; और दोनों मिल जाएं तो परम संयोग घटित होता है।
तुमने कहानी सुनी है कि जंगल में लग गई आग और एक अंधा और एक लंगड़ा बड़ी मुश्किल में पड़े। अंधे को दिखाई नहीं पड़ता, कहां जाए! पैर हैं उसके पास स्वस्थ, भाग सकता है, बच सकता है; लेकिन दिशा नहीं है। लंगड़े को दिखाई पड़ता है–कहां है मार्ग; अभी जंगल का कौन सा हिस्सा अग्नि से नहीं घिरा है; लेकिन लंगड़ा है, दौड़ नहीं सकता; निकलने का उपाय नहीं।
कथा कहती है, दोनों मिल गए; अंधे ने लंगड़े को कंधे पर ले लिया। फिर दोनों की कमियां भर गईं। वे जैसे एक ही व्यक्ति बन गए; अंधे के पैर, लंगड़े की आंखें जुड़ गईं। वे दोनों जंगल से सुरक्षित बाहर आ गए। अग्नि उन्हें नष्ट न कर पाई।
बुद्धि और हृदय जब तक न मिल जाएं, तुम जीवन की अग्नि से बच न पाओगे।
बुद्धि अंधी है। अकेले, हृदय भी पंगु है, बुद्धि भी पंगु है; जुड़ कर दोनों पूर्ण हो जाते हैं। और दोनों तुम्हारे पास हैं; दोनों का उपयोग कर लेना है।
तो ज्ञान को भक्ति का सहारा बनाओ, भक्ति को ज्ञान का सहारा बनाओ; दोनों तुम्हारे पंख बन जाएं, तुम आकाश में उड़ सकोगे। न तो एक पंख से कभी कोई पक्षी उड़ा है, न एक पैर से कोई प्राणी चला है, न एक पतवार से नाव चलती है; दोनों पतवार चाहिए। कोई विरोध नहीं है। और जिन्होंने तुमसे कहा है विरोध है, उन्होंने गलत कहा है। और गलत कहने का कारण यही है कि उन्होंने भी इस महासमन्वय को नहीं जाना। या तो वे बुद्धि से घिरे हुए लोग होंगे, जिनके पास कोरे विचार हैं, शुष्क विचार हैं, तर्क हैं, लेकिन हृदय का कोई नृत्य घटित नहीं हुआ है; और या फिर वे हृदय के लोग होंगे, सीधे-सादे; नाच तो सकते हैं, समझ नहीं है।
उस घड़ी को परम सौभाग्य की घड़ी मानना, जब तुम समझपूर्वक नाच सको। उस घड़ी को परम सौभाग्य मानना, जब तुम विवेकपूर्वक प्रेम कर सको। और परमात्मा ने तुम्हें जो भी दिया है, उसमें किसी का भी अस्वीकार मत करना; क्योंकि उतने ही अंश में तुम पंगु हो जाओगे। तुम पूरे हो, सिर्फ संयोग बिठाना है। वीणा रखी है, तार पड़े हैं; लेकिन तारों को वीणा पर जोड़ना है, तारों को कसना है, साज बिठाना है। तुम्हारे भीतर सब मौजूद है, सिर्फ संयोग मौजूद नहीं है। उस संयोग का नाम ही साधना है कि तुम्हारे भीतर की वीणा और तार मिल जाएं।
सूफी कहते हैं, एक आदमी भूखा मर रहा था। आटा था घर में, जल भी था, चूल्हा भी था, ईंधन भी था; लेकिन उस आदमी को पता नहीं कि कैसे आटा गूंथे, कैसे आग जलाए, कैसे आग पर रोटी सेंके। सब था–भूख भी थी, भोजन भी था–संयोग न बन सका। वह आदमी भूखा ही मर गया!
यह सभी आदमियों की कथा है। तुम्हारे पास सब संयोग है और तुम भूखे हो! ऐसा कुछ भी नहीं है जो तुम्हारे पास मौजूद नहीं है। परमात्मा किसी को इस तरह भेजता ही नहीं; सब साधन देकर भेजता है। लेकिन साधनों को बिठाना पड़ेगा। उनका ठीक अनुपात, ठीक समन्वय, ठीक संगीत बन जाए, तो तुम्हारे भीतर परमात्मा का प्रकाश हो जाएगा। न तो बुद्धि से घिरना, न हृदय से; दोनों तटों के बीच तुम्हारी चेतना बह सके नदी की धार की भांति; तुम गंगा बन जाना; फिर सागर दूर नहीं है। और जिद मत करना कि एक ही किनारे के सहारे बहेंगे; अन्यथा गंगा बह ही न पाएगी; दोनों ही किनारों का सहारा चाहिए। और अंत में दोनों किनारे छूट जाएंगे। लेकिन ध्यान रखना, वह अंत सहारे से ही आएगा।
परम अवस्था में, परम सिद्धावस्था में, न तो भक्ति रह जाती है, न ज्ञान। जब नदी सागर में गिरती है तो फिर कोई भी किनारा नहीं रह जाता, फिर तो नदी सागर हो गई।
इसलिए तीन तरह के लोग संसार में हैं।
एक, जिन्होंने बुद्धि को पकड़ लिया–दार्शनिक, तात्विक। वे बाल की खाल ही निकालते रहते हैं। तर्क की सूखी रेत उनके जीवन में भर जाती है; सोचते बहुत हैं, पहुंचते कहीं भी नहीं।
दूसरे हार्दिक लोग हैं–गाते बहुत हैं, नाचते बहुत हैं। लेकिन सब गाना-नाचना विवेकरहित है; विक्षिप्तता के करीब ज्यादा है, विमुक्ति के करीब नहीं। एक तरह का पागलपन है, एक तरह का नशा है। जिनके पास विवेक नहीं, होश नहीं, उनके लिए धर्म, हृदय एक तरह की शराब है।
फिर तीसरे तरह के लोग हैं, जिन्होंने दोनों का उपयोग कर लिया; और उपयोग करके दोनों के पार हो गए।
उस महा अतिक्रमण की आकांक्षा रखो। उस महा अतिक्रमण की अभीप्सा करो। उस तीसरे बिंदु पर पहुंच जाने का लक्ष्य रखो।
सागर में गिरना है गंगा को, तट दोनों छोड़ देने हैं। लेकिन जल्दी मत करना; सागर तक तो तट के सहारे ही पहुंचना होगा; पहुंचते ही फिर तटों का त्याग हो सकता है।
दूसरा प्रश्न:
धर्म सांसारिक सुखों को अस्थिर और क्षणभंगुर बता कर उसके प्रति हममें वैराग्य पैदा करते हैं। लेकिन क्या उनकी वही क्षणभंगुरता उनके आकर्षण का कारण भी नहीं है?
निश्चित ही, ऐसा ही है; क्षणभंगुरता ही आकर्षण का कारण है। और धर्म जीवन को क्षणभंगुर बता कर वैराग्य पैदा नहीं करते हैं। धर्म तो कहते हैं: जो भी क्षणभंगुर है उसके पीछे दुख आएगा। क्षणभंगुरता नहीं है कारण वैराग्य का, क्षणभंगुरता के पीछे दुख छाया की तरह आता है। दुख कारण है वैराग्य का। क्षणभंगुरता तो आकर्षित करती है, बुलाती है। जितना जल्दी जीवन भागा जाता है, उतना ही मन होता है–भोग लो जल्दी! अब गया, अब गया। कब उठ जाएंगे, पता नहीं। तो भोग लो। जितना ज्यादा भोग सको, भोग लो। जितनी त्वरा से जी सको, जी लो। एक क्षण भी खाली न जाए, चूस लो। एक-एक क्षण की पूरी संभावना को भोग लो।
क्षणभंगुरता आकर्षण है। मौत आ रही है, इसीलिए तो जीवन को हम पकड़ते हैं। अगर मौत आती ही न हो, कौन जीवन को पकड़ेगा? अगर सुख आते हों और कभी जाते ही न हों, कौन चिंता करेगा? आकर्षण का कारण क्षणभंगुरता है। जो चीज जितने जल्दी विलीन हो जाती है, उतनी कीमती मालूम होती है। पत्थर पड़ा है, उसकी उतनी कीमत नहीं है; पास ही फूल खिला है, फूल की बड़ी कीमत है। सुबह खिला है, सांझ खो जाएगा। देख लो, रस ले लो; आंखों को भर लो, तृप्त कर लो। क्योंकि जो खिला है वह मुरझाने की राह पर चल ही पड़ा है। देर नहीं लगेगी, सूरज मध्य आकाश में आ गया है। आधा जीवन तो फूल का जा ही चुका है, कुम्हलाना शुरू हो गया है। इसीलिए तो सौंदर्य में इतना आकर्षण है। अगर सौंदर्य सदा रहता हो, कौन चिंता करेगा?
एक मजे की बात है: कुरूपता ज्यादा स्थायी है सौंदर्य से। कुरूप व्यक्ति जीवन भर कुरूप बना रहता है, सुंदर व्यक्ति जीवन भर सुंदर नहीं होता। कुछ क्षण होते हैं जीवन के, युवा अवस्था के, जब सुंदर होता है; फिर कुम्हला जाता है। और क्या तुमने खयाल किया–जितना सुंदर व्यक्ति हो, उतने जल्दी कुम्हला जाता है! जितना कोमल फूल होगा, उतने जल्दी कुम्हला जाएगा।
दौड़ो, भागो, जल्दी करो! कहां मंदिरों में बैठे भजन-कीर्तन कर रहे हो। भोग लो! भजन-कीर्तन पीछे भी हो जाएगा। और दूसरा ही नहीं बदल रहा है, तुम्हारी भोगने की क्षमता भी प्रतिपल क्षीण होती चली जा रही है। जल्दी करो, मन कहे चला जाता है।
निश्चित ही क्षणभंगुरता आकर्षण का कारण है। अगर चीजें शाश्वत होतीं, कौन चिंता करता?
शायद इसीलिए तो तुमने परमात्मा की चिंता नहीं की है–शाश्वत है, जल्दी भी क्या है? आज नहीं कल, कल नहीं परसों, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में, अगले जन्म में नहीं तो और आगे–परमात्मा खो न जाएगा, जल्दी क्या है? जब भी जाओगे, उसे अपने घर में ही पाओगे। लेकिन ये जीवन के क्षणभंगुर फूल, यह आंखों का सौंदर्य, ये चेहरों की लालिमा, यह युवावस्था, यह तुम्हारे भोगने की क्षमता–यह सब टूटी जा रही है, भागी जा रही है। देर मत करो, मन कहता है।
निश्चित ही क्षणभंगुरता आकर्षण का कारण है। जो भी शाश्वत है, उसमें आकर्षण नहीं रह जाता। जो है ही, और सदा ही है, उसमें आकर्षण का क्या कारण है! सपने ज्यादा सुंदर लगते हैं। अभी आंख खुलेगी और टूट जाएंगे।
धर्म जब तुमसे कहता है कि क्षणभंगुर है जीवन, तो क्षणभंगुर बता कर तुम्हें वैराग्य नहीं लाना चाहता। क्षणभंगुर कह कर यह इशारा करना चाहता है कि क्षण भर के बाद फिर क्या करोगे? क्षण भर नाच लोगे, फिर रोओगे। क्षणभंगुर है अगर जीवन; भोग लोगे क्षण भर, फिर पीछे पछताओगे। चुक जाओगे व्यर्थ की दौड़ में। तितलियों के पीछे जैसे बच्चे दौड़ रहे हैं, ऐसे छोटे-छोटे भोगों के पीछे दौड़ते-दौड़ते थकोगे, गिर जाओगे, मौत समा लेगी तुम्हें। और यह समय जो तुमने क्षणभंगुर की तलाश में गंवाया, उसमें तुमने पाया तो कुछ भी नहीं। क्योंकि पाने के पहले ही चीजें कुम्हला जाती हैं; हाथ में आते-आते ही फूल मुर्दा हो जाते हैं; घर लाते-लाते ही सुख दुख में रूपांतरित हो जाता है।
वैराग्य का उदबोधन दुख के कारण है। धर्म कहता है, देखने की कोशिश करो कि जहां तुम्हें एक क्षण को सुख दिखाई पड़ता है, उसके पीछे अनंत दुख भरा है। और तुम भी इसे भलीभांति जानते हो। जब भी तुमने सुख पाया, पीछे दुख आया है; जब भी तुम प्रसन्न हुए, पीछे आंख आंसुओं से भरी है; जब भी तुम इतराए, तभी तुम गिरे हो; और जब भी तुमने सोचा था सौभाग्य का क्षण आ गया, उसके पीछे ही दुर्भाग्य की रात्रि शुरू हो गई है।
धर्म कहता है, अगर ऐसा सुख चाहिए हो जो कभी खोता नहीं और कभी दुख में रूपांतरित नहीं होता, तो सनातन को खोजो, शाश्वत को खोजो; क्षणभंगुर से जागो। सपनों में खोया गया समय, खोया गया समय है। सत्य को खोजो।
सत्य की परिभाषा क्या है? सत्य की इतनी ही परिभाषा है कि जो सदा था, जो सदा है और सदा रहेगा। असत्य की इतनी ही परिभाषा है कि जो कल नहीं था, अभी है, कल फिर नहीं हो जाएगा। असत्य का अर्थ है, दो नहीं के बीच थोड़ी देर को होना है; दो न होने के बीच थोड़ी देर को होने का भ्रम है। थोड़ा सोचो, जब दोनों तरफ नहीं है, तो बीच में हो कैसे सकेगा!
इसलिए शंकर संसार को माया कहते हैं।
माया का मतलब यह है: कल नहीं थी, आज है, कल फिर नहीं हो जाएगी। तो जो दो कोनों पर नहीं है, वह बीच में हो नहीं सकती, सिर्फ दिखाई पड़ती होगी, भास होता होगा। क्योंकि ‘नहीं’ से ‘है’ कैसे पैदा हो सकता है? और जो ‘है’, वह फिर ‘नहीं’ में कैसे खो सकता है?
तुम नहीं थे एक दिन। जन्म के पहले तुम कहां थे? मृत्यु के बाद तुम कहां रहोगे? थोड़ी सी देर का सपना है। आंख लगी, सपना देख लिया है; आंख खुलते ही खो जाएगा।
सहजो ने कहा है: जगत तरैया भोर की। जैसे सुबह का तारा होता है, आखिरी–अब डूबा, तब डूबा। डबडबाता है। तुम देखते ही रहोगे और देखते ही देखते खो जाएगा।
जगत तरैया भोर की–ऐसा सारा जीवन है।
महावीर ने कहा है: जैसे घास के पत्ते पर ओस की बूंद–ऐसा जीवन है।
घास के पत्ते पर ओस की बूंद को कभी गौर से देखा? अब ढलकी, तब ढलकी। तुम्हारे देखते-देखते ही ढल जाएगी; हवा का जरा सा झोंका काफी है। सूरज का निकलना–भाप बन जाएगी–काफी है। जरा सा धक्का, और गई। जब होती है, तब तो मोतियों कोर् ईष्या होती है। जब होती है बूंद ओस की, तब तो मोती भी शरमाते होंगे, झेंप जाते होंगे, ऐसी चमकती है। पर उसका होना क्या है? न जैसा है; हुई, न हुई, बराबर है।
जीवन क्षणभंगुर है तो सत्य नहीं हो सकता। तुमने जो भी जाना है, अगर वह जाना और फिर खो जाता है, वह सत्य नहीं हो सकता। वह मन की ही भावना रही होगी; वह मन की ही कल्पना रही होगी; वह तुम्हारा ही प्रक्षेपण रहा होगा। वैसी सच्चाई नहीं है, तुमने मान लिया होगा। वह तुम्हारी मान्यता है। मान्यता माया है। तुम्हारे भीतर की कामना को तुम जीवन के पर्दे पर आरोपित करके देखते चले जाते हो।
तुमने कभी खयाल किया–एक स्त्री बहुत सुंदर लगती है या एक पुरुष बहुत सुंदर लगता है; चार दिन बाद वही स्त्री सुंदर नहीं लगती, वही पुरुष सुंदर नहीं लगता! क्या हो गया? वही स्त्री है, वही पुरुष है! चार दिन पहले तुमने अपनी कोई कामना आरोपित कर ली थी, वह कामना टूट गई–पर्दा खाली है, अब उस पर कोई चित्र नहीं रहा।
तुम जो देखते हो अपने चारों तरफ, जब तक तुम मन में भरी कामनाओं से देखते हो, तब तक तुम वही नहीं देख सकते जो है; तब तक तुम वही देखते रहोगे जो तुम देखना चाहते हो। शुद्ध आंख वही देखती है जो है, अशुद्ध आंख वही देख लेती है जो देखना चाहती है। तुम सौंदर्य की तलाश में हो, तो तुम सौंदर्य देख लोगे। अपनी-अपनी व्याख्या है जीवन। व्याख्या के कारण जीवन माया है।
मुल्ला नसरुद्दीन दवाएं बनाता है और बेचता है। एक पैकेट पर उसने लिख रखा था: फायदा न होने पर दाम वापस। मैं उसकी दुकान पर बैठा था। एक आदमी आया, वह बड़ा नाराज था। उसने कहा, महीना भर हो गया दवा फांकते-फांकते, कोई फायदा नहीं हुआ। दाम वापस चाहिए!
नसरुद्दीन ने कहा कि पैकेट पर लिखा है: फायदा न होने पर दाम वापस। तुम्हें न हुआ हो, हमें तो फायदा हुआ है।
अपनी-अपनी व्याख्या है। जीवन को तुम वैसा ही करके देखते हो, जैसा तुम देखना चाहते हो। शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं; सत्यों के अर्थ बदल जाते हैं। तुम अपने आस-पास अपनी ही मान्यताओं का एक संसार खड़ा कर लेते हो, फिर तुम उसी संसार में जीते हो। और आदमी अपने ही कारण खोजता चला जाता है, और कारणों के थेगड़े लगाए चला जाता है, ताकि मान्यताएं टूट न जाएं, फूट न जाएं; जोड़त्तोड़ बिठाता रहता है।
मुल्ला नसरुद्दीन का बाजार में किसी से झगड़ा हो गया। वह आदमी बहुत नाराज था और उसने कहा, एक ऐसा झापड़ा मारूंगा–नसरुद्दीन को कहा–कि बत्तीसों दांत जमीन पर गिर जाएंगे, बत्तीसी नीचे गिर जाएगी।
मुल्ला नसरुद्दीन और जोश में आ गया, उसने कहा कि तूने समझा क्या है! अगर मैंने झापड़ा मारा तो चौंसठों दांत नीचे गिर जाएंगे।
एक तीसरा आदमी पास में खड़ा था, उसने कहा, भई बड़े मियां, इतना तो खयाल रखो कि चौंसठ दांत आदमी के होते ही नहीं।
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, मुझे पता था कि तू भी बीच में कूद पड़ेगा, इसलिए चौंसठ। एक ही झापड़े में दोनों के गिरा दूंगा।
आदमी अपनी…तुमसे भूल भी हो जाए, तो भी तुम भूल स्वीकार नहीं करते। तुम अपनी भूल के लिए भी कारण खोज लेते हो, तर्क खोज लेते हो।
भूल को स्वीकार करना बड़ा साहस है। और जिसने भूल को स्वीकार कर लिया, धीरे-धीरे भूलें तिरोहित हो जाती हैं।
एक स्त्री के तुम प्रेम में हो। तुम बड़ा सपना बांधते हो, स्वर्ग निर्मित करते हो, बड़ी कविताएं पैदा होती हैं–और तुम सोचते हो, बस, अब स्वर्ग मिल गया। चार दिन में स्वर्ग उजड़ जाता है! तब तुम यह नहीं देखते कि मैंने कोई भूल की थी। तब तुम देखते हो–यह स्त्री धोखा दे गई। तुम यह नहीं देखते कि मेरी मन की धारणा टूटी! तुम यह नहीं देखते कि मन की धारणा टूटती ही, सुबह की ओस थी, भोर की तरैया थी, तुम यह नहीं देखते। तुम देखते हो–यह स्त्री धोखा दे गई; यह स्त्री ही गलत थी; दूसरी स्त्री खोजेंगे। फिर दूसरी स्त्री खोजते हो! फिर वही आरोपण! फिर वही भूल! फिर वही नशा! फिर वह भी चार दिन में टूट जाता है, तब भी तुम जागते नहीं।
महाभारत में बड़ी प्राचीन, बड़ी मीठी कथा है कि जब पांडव जंगल में अज्ञातवास पर हैं, भटकते रहे हैं दिन में–दोपहरी–पानी नहीं मिला। सांझ एक भाई खोजने निकला, झील मिल गई। लेकिन जब वह झील में पानी भरने को झुका, तो आवाज आई–रुको! जब तक मेरे प्रश्न का उत्तर न दो, तब तक पानी न भर सकोगे। कोई यक्ष उस झील पर कब्जा किए था। पूछा, क्या है तुम्हारा प्रश्न? यक्ष ने कहा, अगर उत्तर न दिया या उत्तर गलत हुआ, तो तत्क्षण मृत हो जाओगे। अगर उत्तर दिया, तो जल भी मिलेगा और अनंत भेंट भी दूंगा। प्रश्न था कि मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा सत्य क्या है? जो उत्तर दिया–जो भी दिया हो–वह ठीक नहीं था। एक भाई गिरा, मृत हो गया। ऐसे चार भाई एक के बाद एक गए। अंत में युधिष्ठिर गए कि हो क्या रहा है! चारों भाइयों को मरे हुए पाया। यक्ष की आवाज आई–सावधान! पहले मेरे प्रश्न का उत्तर, अन्यथा वही होगा जो इनका हुआ है। पानी एक ही शर्त पर भर सकते हो, वह मेरा ठीक उत्तर मिल जाए। क्योंकि उसी उत्तर पर मेरी मुक्ति निर्भर है। जिस दिन मुझे ठीक उत्तर मिल जाएगा, उस दिन मैं भी मुक्त हो जाऊंगा; यह मेरा बंधन यक्ष होने का टूट जाएगा। प्रश्न है: मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा सत्य क्या है? युधिष्ठिर ने कहा, यही कि चाहे कितने ही अनुभव मिलें, मनुष्य सीख नहीं पाता। यक्ष मुक्त हो गया। चारों भाई पुनरुज्जीवित हो गए। उसकी प्रसन्नता में, मुक्ति की प्रसन्नता में उसने चारों को पुनरुज्जीवन दिया।
मनुष्य को कितने ही अनुभव हो जाएं, सीख नहीं पाता। एक स्त्री से छूटता है, दूसरी! दूसरी से छूटता है, तीसरी! एक उपद्रव मिटता है, दूसरा! एक सफलता का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है, तो दूसरा! एक दौड़ बंद नहीं हो पाती कि दूसरी शुरू कर देता है, दौड़ से नहीं मुक्त होता। एक वासना गिर नहीं पाती कि दस खड़ी कर लेता है। वासना की भ्रांति नहीं दिख पाती। और हर चीज के पीछे अपने तर्क खोज लेता है, अपने कारण खोज लेता है। और कभी यह नहीं देखता कि भूल मेरी होगी। सदा भूल किसी और पर थोप देता है। निश्चिंत होकर फिर भूल करने में लग जाता है।
दूसरे पर भूल थोपना, भूल को और-और करने की व्यवस्था है। जब भी तुम किसी को कहते हो कि तुम जिम्मेवार हो, तभी तुम अपनी जिम्मेवारी से इनकार कर रहे हो। और वही जिम्मेवारी तुम्हें जगा सकती थी; क्योंकि उसी जिम्मेवारी के क्षण में तुम्हें दिखाई पड़ सकता था कि मैं भूल कर रहा हूं।
भूल किसी स्त्री में नहीं है, न किसी पुरुष में है; भूल उस कामना और कल्पना में है जो तुम किसी स्त्री या पुरुष पर आरोपित करते हो। वह क्षणभंगुर है; वह कामना टूटेगी।
जरा सोचो तो, मन का एक विचार तुम कितनी देर तक थिर रख सकते हो? भोर की तरैया भी थोड़ी ज्यादा देर टिकती है। ओस का कण भी कभी-कभी देर तक टिक जाता है। लेकिन तुम अपने मन में एक विचार को कितनी देर टिका सकते हो? क्षण भर है, और गया। पकड़ो तो भी पकड़ में नहीं आता, मुट्ठी खाली रह जाती है। दौड़ो तो भी कहीं खबर नहीं मिलती–कहां गया। हवा के झोंके की तरह आता है और खो जाता है। ऐसे मन के आधार पर तुम जो संसार में जीते हो, वह जीवन क्षणभंगुर है।
संसार क्षणभंगुर है, ऐसा मत समझ लेना। वह तो सिर्फ कहने का एक ढंग है। संसार क्षणभंगुर नहीं है। संसार तो तुम नहीं थे, तब भी था; तुम नहीं रहोगे, तब भी रहेगा। संसार तो शाश्वत है। लेकिन तुम जो संसार बना लेते हो अपने ही मन के आधार पर, वह क्षणभंगुर है। वस्तुतः संसार तो है ही नहीं, परमात्मा है। परमात्मा के पर्दे पर तुम जो अपनी कामना के चित्र बना लेते हो, वे संसार हैं। और उस संसार में दुख ही दुख है।
रोज तुम्हें दुख मिलता है, फिर भी तुम कल के सुख की आशा में जीए चले जाते हो। कितनी बार तुम गिरते हो, फिर उठ-उठ कर खड़े हो जाते हो। कितनी बार जीवन तुम्हें कहता है कि तुम जो खोज रहे हो वह मिलेगा नहीं, लेकिन तुम कोई न कोई बहाना खोज लेते हो–कोई और भूल हो गई, कोई और गलती हो गई–अब की बार सब ठीक कर लेंगे, अब ऐसी भूल न हो पाएगी।
मैंने सुना है, कारागृह से एक कैदी मुक्त हुआ। तेरहवीं बार कारागृह में बंद हुआ था। मुक्त करते क्षण में जेलर को भी दया आ गई। उसकी आधी जिंदगी ऐसे ही जेल में बीत गई। उसने कहा, अब तो समझो! अब तो कुछ ऐसा करो कि जेल आना न हो!
उसने कहा, कोशिश तो हर बार करते हैं, फिर-फिर आना हो जाता है। मगर अब की बार–आप ठीक कह रहे हैं–अब की बार फिर न आऊंगा।
जेलर बहुत प्रसन्न हुआ, उसने कहा कि हम प्रसन्न हैं।
लेकिन वह कैदी बोला कि आपकी प्रसन्नता से लगता है आप समझे नहीं। मैं यह कह रहा हूं कि अब तक जो भूलें करके मैं पकड़ जाता था, अब न करूंगा। चोरी न करूंगा, यह मैं नहीं कह रहा हूं। लेकिन जिन कारणों से मैं पकड़ जाता था, वे कारण अब न दोहराऊंगा। और तेरह बार अनुभव होते-होते अब ऐसा कोई कारण नहीं बचा है, जिसे मैंने समझ न लिया हो। चोरी तो करूंगा, लेकिन अब भूल-चूक बिलकुल न होगी।
चोरी भूल-चूक नहीं है, भूल-चूक तो उन भूलों में है जिनके कारण चोरी पकड़ जाती है। जेल तुम जिनको भेजते हो, वे वहां से और निष्णात अपराधी होकर वापस आ जाते हैं। क्योंकि वहां और दादा-गुरु मिल जाते हैं, और भी पुराने घाघ। उनसे काफी सोच-समझ कर, विचार-विमर्श करके, अनुभव से सीख कर, शिक्षा लेकर, गुरुमंत्र पाकर वापस लौट आते हैं। फिर वही करते हैं। चोरी भूल नहीं है, ऐसा लगता है; भूल पकड़े जाने में है।
तुम भी सोचो–अगर तुम कुछ ऐसी तरकीब पा जाओ कि तुम पकड़े न जा सको, फिर तुम चोरी करोगे या नहीं? तुम्हारा मन साफ कहेगा: फिर करने में कोई बुराई ही नहीं है। चोरी में थोड़े ही बुराई है, पकड़े जाने में बुराई है। और जब तक तुम ऐसा समझ रहे हो, तब तक तुम दुख में जीओगे।
पकड़े जाने में दुख नहीं है, चोर होने में दुख है। चोरी करने में दुख है, पकड़े जाने में दुख नहीं है। मगर जब तुम्हें दिखाई पड़ेगा कि मेरे होने के ढंग में भूल है, तब तुम पाओगे कि दुख मेरे होने के गलत ढंग से पैदा होता है। यही अर्थ है सारे कर्म के सिद्धांत का, और कुछ अर्थ नहीं है। इतना ही अर्थ है कि तुम दुख पाते हो तो तुम्हारे अपने ही कर्मों के कारण; तुम सुख पाते हो तो भी अपने ही कर्मों के कारण।
और अगर तुम आनंद पाना चाहते हो, तो अकर्म की दशा चाहिए–जहां न सुख रह जाए, न दुख; जहां परम शांति हो जाए; जहां तुम दोनों के पार हो जाओ; जहां तुम्हारे भीत

Sunday, January 24, 2016

Sayings On Truth



'सांख्य' शब्द का अर्थ

सांख्य शब्द की निष्पत्ति संख्या शब्द से हुई है। संख्या शब्द 'ख्या' धातु में सम् उपसर्ग लगाकर व्युत्पन्न किया गया है जिसका अर्थ है 'सम्यक् ख्याति'। संसार में प्राणिमात्र दु:ख से निवृत्ति चाहता है। दु:ख क्यों होता है, इसे किस तरह सदा के लिए दूर किया जा सकता है- ये ही मनुष्य के लिए शाश्वत ज्वलन्त प्रश्न हैं। इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ना ही ज्ञान प्राप्त करना है। 'कपिल दर्शन' में प्रकृति-पुरुष-विवेक-ख्याति (ज्ञान) 'सत्त्वपुरुषान्यथाख्याति' इस ज्ञान को ही कहा जाता है। यह ज्ञानवर्धक ख्याति ही 'संख्या' में निहित 'ज्ञान' रूप है। अत: संख्या शब्द 'सम्यक् ज्ञान' के अर्ध में भी गृहीत होता है। इस ज्ञान को प्रस्तुत करने या निरूपण करने वाले दर्शन को सांख्य दर्शन कहा जाता है।







Monday, September 28, 2015

श्रेष्ठतम वचन कौन सा है



लाओत्से से कोई पूछता कि तुम्हारा सबसे श्रेष्ठतम वचन कौन सा है।
तो लाओत्‍से कहता है, यही। जो अभी-अभी बोल रहा हूं।
बान गॉग से कोई पूछता है,
तुम्‍हारी श्रेष्ठतम चित्र कृति कौन सी है,
तो वान गॉग पेंट कर रहा है और कहता है, यही।
जो मैं अभी पेंट कर रहा हूँ।
अभी जो हो रहा है, वही सब कुछ है,
इस अभी में जो सनातन को
स्‍मरण रख कर जीना शुरू कर देता है।
उसे रास्‍ता मिल गया, उसे सेतु मिल गया।
छोड़े अतीत को, छोड़े भविष्‍य को, पकड़े वर्तमान को।

धीरे-धीरे अतीत को विसर्जित करते जाएं।

Friday, July 24, 2015

प्रकृति से खिलवाड़ भटका रही है मेघों को

प्रकृति से खिलवाड़ भटका रही है मेघों को

ज्येष्ठ माह की तपन में  सुलगती वसुंधरा को श्यामल  वर्ण मेघ जब अपनी शीतल बौछारों से प्यासी धरा को तृप्त करते हैं तब यह धरा पुनः श्रृंगारित होती है। इस  मनोरम और मंगल छटा को निहारकर थलचर, नभचर एवं जलचर विभिन्न क्रीड़ाओं में लिप्त होकर आनंदित होते हैं। दो ऋतुओं के मिलने का यह अद्भुत संयोग कवियों की कल्पना को उत्प्रेरित करता है। अपनी प्रेयसी की  विरह अग्नि में जलता हुआ, महाकवि कालिदास के महाकाव्य मेघदूत का अर्धमृत यक्ष जब वर्षा ऋतु में पर्वतों पर उमड़ते काले मेघों के भव्य दृश्य को देखता है तो उसमें पुनः जीवन का संचार होता है और अपनी प्रिया तक सन्देश पहुंचाने के लिए मेघों से विनय करता है। 

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यक्ष द्वारा अनुनय एवं अपनी प्रियतमा तक पहुंचने के मार्ग का अप्रतिम चित्रण मेघदूत और कालिदास दोनों को अमरत्व प्रदान करते हैं। रामचरितमानस के किष्किन्धा कांड में तुलसीदासजी ने विभिन्न उपमाओं के साथ वर्षा ऋतु  का मनोरम वर्णन किया है। वहीं भगवान राम बादलों की गर्जन तथा आकाश में दामिनी के तांडव स्वरूप को देखकर माता सीता की सुरक्षा को लेकर सौमित्र से अपना भय प्रकट करते हैं। यही समय है जब पृथ्वी के गर्भ में पड़े लगभग निष्प्राण बीज अंकुरित हो जाते हैं, असंख्य आत्माएं शरीर धारण कर लेती हैं। छोटी-छोटी नदियां भी इस ऋतु में विस्तार पा जाती हैं और इठलाती हुई परम समागम के मार्ग पर निकल पड़ती हैं। 
आइए, साहित्य की मनोरम दुनिया से अब यथार्थ के धरातल पर चलें।  अर्थशास्त्रियों के लिए मानसून के मायने कुछ और हैं। भारत की अर्थव्यवस्था का सम्पूर्ण आधार ही मानसून है।  वर्षा की हर बूंद का हिसाब रखने वाले इन विशेषज्ञों की निगाहें आने वाले वर्ष की अर्थव्यवस्था पर होती है। मानसून के आंकड़ों की सहायता से ये आने वाले वर्ष में अनाज का उत्पादन, व्यापार-व्यवसाय की स्थिति और सकल उत्पाद (जीडीपी ) का अनुमान लगाते हैं। पीने के पानी की उपलब्धता एवं बिजली उत्पादन भी मानसून पर निर्भर है।  
दूसरी ओर वैज्ञानिकों के लिए मानसून सिस्टम, प्राणी संसार को प्रकृति की  एक असाधारण देन है। इस सिस्टम को समझने और इसका गणितीय आकलन करने की वैज्ञानिकों की क्षमता को हर वर्ष चुनौती मिलती है। लगभग छह महीने तक भारत भूमि से अरब सागर और दक्षिण पश्चिमी हिन्द महासागर की ओर बहने वाली हवाएं जब विपरीत दिशा में बहने लगती हैं तब भारत में वर्षा ऋतु का आगाज़ होता है। ग्रीष्म ऋतु में ताप से पृथ्वी की हवाएं गर्म होकर आसमान की ओर उठती हैं जिससे कम दबाव का क्षेत्र बनता है।  इस कम दबाव के क्षेत्र को भरने आर्द्र मानसूनी हवाएं बादलों के साथ पहुंच जाती हैं और इस तरह मानसून पूरे भारत में विस्तार ले लेता है। 
मानसून सिस्टम भारत  के लिए एक वरदान है क्योंकि ये मानसूनी हवाएं हमारे ग्रीष्म काल को छोटा कर देती हैं।  यदि ये हवाएंन हों तो सितम्बर माह तक ग्रीष्म ऋतु जारी रहती। इसकी तुलना में यदि अरब देशों की बात की जाये तो यहां मानसून सिस्टम न होने से ग्रीष्म काल पूरा छह माह का होता है जो सितम्बर तक जारी रहता है। यह तब तक चलता है जब तक कि सूर्य नारायण दक्षिणायन यानि दक्षिणी गोलार्ध में प्रवेश न कर लें। 
विधाता का भी क्या अद्भुत  गणित है कि यदि दो-चार दिन इधर-उधर छोड़ दें तो हर वर्ष 1 जून को मानसून भारत की दक्षिण पश्चिमी  सीमा पर दस्तक देती है। प्रकृति ने तो अपने कायदे बांध रखे हैं किन्तु मनुष्य अपनी सीमाओं को लांघ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ती पृथ्वी की उष्णता, प्रकृति की चाल में मनुष्य का सीधे-सीधे हस्तक्षेप है। प्राकृतिक सम्पदा का दोहन मनुष्य की मजबूरी है किन्तु इसकी अति मनुष्य की अर्थ लिप्सा का परिणाम है। स्पष्ट है कि भारतीय उपमहाद्वीप का मानसून सिस्टम इस उपमहाद्वीप की जीवन रेखा है और यदि हम इस सिस्टम के साथ खिलवाड़ जारी रखते हैं तो हमें नतीजे भी भुगतने को तैयार रहना होगा। इसके कई संकेत कश्मीर में निरंतर आ रही बाढ़ों में, चेरापूंजी में वर्षों से रिकॉर्डतोड़ में आ रही कमी में, कहीं अनावृष्टि तो कहीं अतिवृष्टि में मिलने लगे हैं। 
संतोष की बात यह है कि नई पीढ़ी ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को समझती है और इस प्रक्रिया को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है। इस घातक प्रक्रिया को रोकने के लिए चिंतित और क्रियाशील हैं। विश्वास है कि खतरों के बहुत बढ़ने के पहले ही उनकी रोकथाम के प्रयत्न सफल होंगे तब शायद फिर कोई कालिदास का यक्ष आनंदमग्न मुद्रा में अपने ठीक समय पर उभरे मानसूनी मेघों को अपनी प्रियतमा की ओर प्रेम सन्देश ले जाने को प्रेरित करेगा। भारत भूमि अपने स्वर्णिम अतीत की भांति सदा 'शस्य श्यामलाम' रहे यही इस लेखक की कामना है।

Sunday, July 19, 2015

तंत्र-सूत्र—विधि-05

भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार को मन के सामने करो। फिर सहस्‍त्रार तक रूप को श्‍वास-तत्‍व से, प्राण से भरने दो। वहां वह प्रकाश की तरह बरसेगा।

यह विधि पाइथागोरस को दी गई थी। पाइथागोरस इसे लेकर यूनान वापस गए। और वह पश्‍चिम के समस्‍त रहस्‍यवाद के आधार बन गए। पश्‍चिम में अध्‍यात्‍मवाद के वे पिता है। यह विधि बहुत गहरी विधियों में ऐ एक है। इसे समझने की कोशिश करो।
‘’भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर करो।‘’
आधुनिक शरीर-शस्‍त्र कहता है, वैज्ञानिक शोध कहती है कि दो भृकुटियों के बीच में ग्रंथि है वह शरीर का सबसे रहस्‍यपूर्ण भाग है। जिसका नाम पाइनियल ग्रंथि है। यही तिब्‍बतियों की तीसरी आँख है। और यही है शिव का नेत्र। तंत्र के शिव का त्रिनेत्र। दो आंखों के बीच एक तीसरी आँख भी है। लेकिन यह सक्रिय नहीं है। यह है, और यह किसी भी समय सक्रिय हो सकती है। निसर्गत: यह सक्रिय नहीं है। इसको सक्रिय करने के लिए संबंध में तुम को कुछ करना पड़ेगा। यह अंधी नहीं है, सिर्फ बंद है। यह विधि तीसरी आँख को खोलने की विधि है।
‘’भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर…..।‘’
आंखे बंद कर लो और फिर दोनों आंखों को बंद रखते हुए भौंहों के बीच में दृष्‍टि को स्‍थिर करो—मानो कि दोनों आंखों से तुम देख रहे हो। और समग्र अवधान को वही लगा दो।
यह विधि एकाग्र होने की सबसे सरल विधियों में से एक है। शरीर के किसी दूसरे भाग में इतनी आसानी से तुम अवधान को नहीं उपलब्‍ध हो सकते। यह ग्रंथि अवधान को अपने में समाहित करने में कुशल है। यदि तुम इस पर अवधान दोगे तो तुम्‍हारी दोनों आंखे तीसरी आँख से सम्‍मोहित हो जाएंगी। वे थिर हो जाएंगी, वे वहां से नहीं हिल सकेंगी। यदि तुम शरीर के किसी दूसरे हिस्‍से पर अवधान दो तो वहां कठिनाई होगी। तीसरी आँख अवधान को पकड़ लेती है। अवधान को खींच लेती है। अवधान के लिए वह चुंबक का काम करती है।
इसलिए दुनिया भी की सभी विधियों में इसका समावेश किया गया है। अवधान को प्रशिक्षित करने में यह सरलतम है, क्‍योंकि इसमे तुम ही चेष्‍टा नही करते, यह ग्रंथि भी तुम्‍हारी मदद करती है। यह चुंबकीय है। तुम्‍हारे अवधान को यह बलपूर्वक खींच लेती है।
तंत्र के पुराने ग्रंथों में कहा गया है कि अवधान तीसरी आँख का भोजन है। यह भूखी है; जन्‍मों-जन्‍मों से भूखी है। जब तुम इसे अवधान देते हो यह जीवित हो उठती है। इसे भोजन मिल गया है। और जब तुम जान लोगे कि अवधान इसका भोजन है, जान लोगे कि तुम्‍हारे अवधान को यह चुंबक की तरह खींच लेती है। तब अवधान कठिन नहीं रह जाएगा। सिर्फ सही बिंदु को जानना है।
इस लिए आँख बंद कर लो, और अवधान को दोनों आंखों के बीच में घूमने दो और उस बिंदू को अनुभव करो। जब तुम उस बिंदु के करीब होगें। अचानक तुम्‍हारी आंखे थिर हो जाएंगी। और जब उन्‍हें हिलाना कठिन हो जाए तब जानो कि सही बिंदु मिल गया।
‘’भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार को मन के सामने रखो।‘’
अगर यह अवधान प्राप्‍त हो जाए तो पहली बार एक अद्भुत बात तुम्‍हारे अनुभव में आएगी। पहली बार तुम देखोगें कि तुम्‍हारे विचार तुम्‍हारे सामने चल रहे है, तुम साक्षी हो जाओगे। जैसे कि सिनेमा के पर्दे पर दृश्‍य देखते हो, वैसे ही तुम देखोगें कि विचार आ रहे है, और तुम साक्षी हो। एक बार तुम्‍हारा अवधान त्रिनेत्र-केंद्र पर स्‍थिर हो जाए तुम तुरंत विचारों के साक्षी हो जाओगे।
आमतौर से तुम साक्षी नहीं होते, तुम विचारों के साथ तादात्म्य कर लेते हो। यदि क्रोध है तो तुम क्रोध हो जाते हो। यदि एक विचार चलता है तो उसके साक्षी होने की बजाएं तुम विचार के साथ एक हो जाते हो। उससे तादात्‍म्‍य करके साथ-साथ चलने लगते हो। तुम विचार ही बन जाते हो, विचार का रूप ले लेते हो, जब क्रोध उठता है तो तुम क्रोध बन जाते हो। और जब लोभ उठता है तब लोभ बन जाते हो। कोई भी विचार तुम्‍हारे साथ एकात्‍म हो जाता है। और उसके ओर तुम्‍हारे बीच दूरी नहीं रहती।
लेकिन तीसरी आँख पर स्‍थिर होते ही तुम एकाएक साक्षी हो जाते हो। तीसरी आँख के जरिए तुम साक्षी बनते हो। इस शिवनेत्र के द्वारा तुम विचारों को वैसे ही चलता देख सकते हो जैसे आसमान पर तैरते बादलों को, या रहा पर चलते लोगो को देखते हो।
जब तुम अपनी खिड़की से आकाश कोया रहा चलते लोगों को देखते हो तब तुम उनसे तादात्‍म्‍य नहीं करते। तब तुम अलग होते हो, मात्र दर्शक रहते हो—बिलकुल अलग। वैसे ही अब जब क्रोध आता है तब तुम उसे एक विषय की तरह देखते हो। अब तुम यह नहीं सोचते कि मुझे क्रोध हुआ। तुम यही अनुभव करते हो कि तुम क्रोध से घिरे हो। क्रोध की एक बदली तुम्‍हारे चारो और घिर गई। और जब तुम खुद क्रोध नहीं रहे तब क्रोध नापुंसग हो जाता है। तब वह तुमको नहीं प्रभावित कर सकता। तब तुम अस्‍पर्शित रह जाते हो। क्रोध आता है और चला जाता है। और तुम अपने में केंद्रित रहते हो।
यह पाँचवीं विधि साक्षित्‍व को प्राप्‍त करने की विधि है।
‘’भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार को मन के सामने करो।‘’
अब अपने विचारों को देखो, विचारों का साक्षात्‍कार करो।
‘’फिर सहस्‍त्रार तक रूप को श्‍वास तत्‍व से प्राण से भरने दो। वहां वह प्रकाश की तरह बरसेगा।‘’
जब अवधान भृकुटियों के बीच शिवनेत्र के केंद्र पर स्‍थिर होता है। तब दो चीजें घटित होती है।
और यही चीज दो ढंगों से हो सकती है। एक, तुम साक्षी हो जाओ तो तुम तीसरी आँख पर थिर हो जाते हो। साक्षी हो जाओ, जो भी हो रहा हो उसके साक्षी हो जाओ। तुम बीमार हो, शरीर में पीड़ा है, तुम को दुःख और संताप है, जो भी हो, तुम उसके साक्षी रहो, जो भी हो, उससे तादात्‍म्‍य न करो। बस साक्षी रहो—दर्शक भर। और यदि साक्षित्व संभव हो जाए, तो तुम तीसरे नेत्र पर स्‍थिर हो जाओगे।
इससे उलटा भी हो सकता है। यदि तुम तीसरी आँख पर स्‍थिर हो जाओ, तो साक्षी हो जाओगे।। ये दोनों एक ही बात है।
इसलिए पहली बात: तीसरी आँख पर केंद्रित होते ही साक्षी आत्‍मा का उदय होगा। अब तुम अपने विचारों का सामना कर सकते हो। और दूसरी बात: और अब तुम श्‍वास-प्रश्‍वास की सूक्ष्‍म और कोमल तरंगों को भी अनुभव कर सकते हो। अब तुम श्‍वसन के रूप को ही नहीं, उसके तत्‍व को , सार को, प्राण को भी समझ सकते हो।
पहले तो यह समझने की कोशिश करें कि ‘’रूप’’ और ‘’श्‍वास-तत्‍व’’ का क्‍या अर्थ है। जब तुम श्‍वास लेते हो, तब सिर्फ वायु की ही श्‍वास नहीं लेते। वैज्ञानिक तो यही कहते है कि तुम वायु की ही श्‍वास लेते हो। जिसमें आक्‍सीजन, हाइड्रोजन तथा अन्‍य तत्‍व रहते है। वे कहते है कि तुम वायु की श्‍वास लेते हो।
लेकिन तंत्र कहता है कि हवा तो मात्र वाहन है, असली चीज नहीं है। असल में तुम प्राण की श्‍वास लेते हो। हवा तो माध्‍यम भर है। प्राण उसका सत्‍व है, सार है। तुम न सिर्फ हवा की, बल्‍कि प्राण की श्‍वास लेते हो।
आधुनिक विज्ञान अभी नहीं जान सका है कि प्राण जैसी कोई वस्‍तु भी है। लेकिन कुछ शोधकर्ताओं ने कुछ रहस्‍यमयी चीज का अनुभव किया है। श्‍वास में सिर्फ हवा हम नहीं लेते, वह बहुत से आधुनिक शोधकर्ताओं ने अनुभव किया है। विशेषकर एक नाम उल्‍लेखनीय है। वह है जर्मन मनोवैज्ञानिक विलहेम रेख का। जिसने इसे आर्गन एनर्जी या जैविक ऊर्जा का नाम दिया है। वह प्राण ही है। वह कहता है कि जब आप श्‍वास लेते है, तब हवा तो मात्र आधार है, पात्र है, जिसके भीतर एक रहस्‍यपूर्ण तत्‍व है, जिसे आर्गन या प्राण या एलेन वाइटल कह सकते है। लेकिन वह बहुत सूक्ष्म है। वास्‍तव में वह भौतिक नहीं है। पदार्थ गत नहीं है। हवा भौतिक है, पात्र भौतिक है; लेकिन उसके भीतर से कुछ सूक्ष्‍म, अलौकिक तत्‍व चल रहा है।
इसका प्रभाव अनुभव किया जा सकता है। जब तुम किसी प्राणवान व्‍यक्‍ति के पास होते हो, तो तुम अपने भीतर किसी शक्‍ति को उगते देखते हो। और जब किसी बीमार के पास होते हो, तो तुमको लगता है कि तुम चूसे जा रहे हो। तुम्‍हारे भीतर से कुछ निकाला जा रहा है। जब तुम अस्‍पताल जाते हो, तब थके-थके क्‍यों अनुभव करते हो? वहां चारों ओर से तुम चूसे जाते हो। अस्‍पताल का पूरा माहौल बीमार होता है और वहां सब किसी को अधिक प्राण की, अधिक एलेन वाइटल की जरूरत है। इसलिए वहां जाकर अचानक तुम्‍हारा प्राण तुमसे बहने लगता है। जब तुम भीड़ में होते हो, तो तुम घुटन महसूस क्‍यों करते हो। इसलिए कि वहां तुम्‍हारा प्राण चूसा जाने लगता है। और जब तुम प्रात: काल अकेले आकाश के नीचे या वृक्षों के बीच होते हो, तब फिर अचानक तुम अपने में किसी शक्‍ति का, प्राण का उदय अनुभव करते हो। प्रत्‍येक का एक खास स्‍पेस की जरूरत है। और जब वह स्‍पेस नहीं मिलता है तो तुमको घुटन महसूस होती है।
विलहेम रेख ने कई प्रयोग किए। लेकिन उसे पागल समझा गया। विज्ञान के भी अपने अंधविश्‍वास है। और विज्ञान बहुत रूढ़िवादी होता है। विज्ञान अभी भी नहीं समझता है कि हवा से बढ़कर कुछ है; वह प्राण है। लेकिन भारत सदियों से उस पर प्रयोग कर रहा है।
तुमने सुना होगा—शायद देखा भी हो—कि कोई व्‍यक्‍ति कई दिनों के लिए भूमिगत समाधि में प्रवेश कर गया। जहां हवा का कोई प्रवेश नहीं था। 1880 में मिस्‍त्र में एक आदमी चालीस वर्षों के लिए समाधि में चला गया था। जिन्‍होंने उसे गाड़ा था वे सभी मर गए। क्‍योंकि वह 1920 में समाधि से बहार आने वाला था।
1920 में किसी को भरोसा नहीं था कि वह जीवित मिलेगा। लेकिन वह जीवित था और उसके बाद भी वह दस वर्षों तक जीवित रहा। वह बिलकुल पीला पड़ गया था, परंतु जीवित था। और उसको हवा मिलने की कोई संभावना नहीं थी।
डॉक्टरों ने तथा दूसरों ने उससे पूछा कि इसका रहस्‍य क्‍या है? उसने कहां हम नहीं जानते; हम इतना ही जानते है कि प्राण कही भी प्रवेश कर सकता है। और वह है। हवा वहां नहीं प्रवेश कर सकती, लेकिन प्राण कर सकता है।
एक बार तुम जान जाओ कि श्‍वास के बिना भी कैसे तुम प्राण को सीधे ग्रहण कर सकते हो, तो तुम सदियों तक के लिए भी समाधि में जा सकते हो।
तीसरी आँख पर केंद्रित होकर तुम श्‍वास के सार तत्‍व को, श्‍वास को नहीं, श्‍वास के सार तत्‍व प्राण को देख सकेत हो। और अगर तुम प्राण को देख सके, तो तुम उस बिंदु पर पहुंच गए जहां से छलांग लग सकती है, क्रांति घटित हो सकती है।
सूत्र कहता है: ‘’सहस्त्रार तक रूप को प्राण से भरने दो।‘’
और जब तुम को प्राण का एहसास हो, तब कल्‍पना करो कि तुम्‍हारा सिर प्राण से भर गया है। सिर्फ कल्‍पना करो, किसी प्रयत्‍न की जरूरत नहीं है। और मैं बताऊंगा कि कल्‍पना कैसे काम करती है। तब तुम त्रिनेत्र-बिंदु पर स्‍थिर हो जाओ तब कल्‍पना करो, और चीजें आप ही और तुरंत घटित होने लगती है।
अभी तुम्‍हारी कल्‍पना भी नपुंसक है। तुम कल्‍पना किए जाते हो और कुछ भी नहीं होता। लेकिन कभी-कभी अनजाने साधारण जिंदगी में भी चीजें घटित होती है। तुम अपने मित्र की सोच रहे हो और अचानक दरवाजे पर दस्‍तक होती है। तुम कहते हो कि सांयोगिक था कि मित्र आ गया। कभी तुम्‍हारी कल्‍पना संयोग की तरह भी काम करती है।
लेकिन जब भी ऐसा हो, तो याद रखने की चेष्‍टा करो और पूरी चीज का विश्‍लेषण करो। जब भी लगे कि तुम्‍हारी कल्‍पना सच हुई है। तुम भीतर जाओ और देखो। कहीं न कहीं तुम्‍हारा अवधान तीसरे नेत्र के पास रहा होगा। दरअसल यह संयोग नहीं था। यह वैसा दिखता है; क्‍योंकि गुह्म विज्ञान का तुमको पता नहीं है। अनजाने ही तुम्‍हारा मन त्रिनेत्र केंद्र के पास चला गया होगा। और अवधान यदि तीसरी आँख पर है तो किसी घटना के सृजन के लिए उसकी कल्‍पना काफी है।
यह सूत्र कहता है कि जब तुम भृकुटियों के बीच स्‍थिर हो और प्राण को अनुभव करते हो, तब रूप को भरने दो। अब कल्‍पना करो कि प्राण तुम्‍हारे पूरे मस्‍तिष्‍क को भर रहे है। विशेषकर सहस्‍त्रार को जो सर्वोच्‍च मनस केंद्र है। उस क्षण तुम कल्‍पना करो। और वह भर जाएगा। कल्‍पना करो कि वह प्राण तुम्‍हारे सहस्‍त्रार से प्रकाश की तरह बरसेगा। और वह बरसने लगेगा। और उस प्रकाश की वर्षा में तुम ताजा हो जाओगे। तुम्‍हारा पुनर्जन्‍म हो जाएगा। तुम बिलकुल नए हो जाओगे। आंतरिक जन्‍म का यही अर्थ है।
यहां दो बातें है। एक, तीसरी आँख पर केंद्रित होकर तुम्‍हारी कल्‍पना पुंसत्‍व को, शुद्धि को उपलब्‍ध हो जाती है। यही कारण है कि शुद्धता पर, पवित्रता पर इतना बल दिया गया है। इस साधना में उतरने के पहले शुद्ध बने।
तंत्र के लिए शुद्धि कोई नैतिक धारणा नहीं हे। शुद्धि इसलिए अर्थपूर्ण है कि यदि तुम तीसरी आँख पर स्‍थिर हुए और तुम्‍हारा मन अशुद्ध रहा, तो तुम्‍हारी कल्‍पना खतरनाक सिद्ध हो सकती है—तुम्‍हारे लिए भी और दूसरें के लिए भी। यदि तुम किसी की हत्‍या करने की सोच रहे हो, उसका महज विचार भी मन में है। तो सिर्फ कल्‍पना से उस आदमी की मृत्‍यु घटित हो जाएगी। यही कारण है कि शुद्धता पर इतना जोर दिया जाता है।
पाइथागोरस को विशेष उपवास और प्राणायाम से गुजरने को कहा गया; क्‍योंकि यहां बहुत खतरनाक भूमि से यात्री गुजरता है। जहां भी शक्‍ति है, वहां खतरा है। यदि मन अशुद्ध है तो शक्‍ति मिलने पर आपके अशुद्ध विचार शक्‍ति पर हावी हो जाएंगे।
कई बार तुमने हत्‍या करने की सोची है; लेकिन भाग्‍य से वहां कल्‍पना न काम नहीं किया। यदि वह काम करे, यदि वह तुरंत वास्तविक हो जाए तो वह दूसरों के लिए ही नहीं तुम्‍हारे लिए भी खतरनाक सिद्ध हो सकती है। क्‍योंकि कितनी ही बार तुमने आत्‍म हत्‍या की सोची है। अगर मन तीसरी आँख पर केंद्रित है तो आत्‍महत्‍या का विचार भी आत्‍महत्‍या बन जाएगा। तुमको विचार बदलने का समय भी नहीं मिलेगा। वह तुरंत घटित हो जाएगी।
तुमने किसी को सम्‍मोहित होते देखा है। जब कोई सम्‍मोहित किया जाता है, तब सम्मोहन विद जो भी कहता है, सम्‍मोहित व्‍यक्‍ति तुरंत उसका पालन करता है। आदेश कितना ही बेहूदा हो तर्कहीन हो असंभव ही क्‍या न हो। सम्‍मोहित व्‍यक्‍ति उसका पालन करता है। क्‍या होता है?
यह पांचवी विधि सब सम्मोह न की जड़ में है। जब कोई सम्‍मोहित किया जाता है, तब उसे एक विशेष बिंदू पर, किसी प्रकाश पर या दीवार पर लगे किसी चिन्‍ह पर या किसी भी चीज पर या सम्‍मोहक की आँख पर ही अपनी दृष्‍टि केंद्रित करने को कहा जाता है। और जब तुम किसी खास बिंदू पर दृष्‍टि केंद्रित करते हो, उसके तीन मिनट के अंदर तुम्‍हारा आंतरिक अवधान तीसरी आँख की और बहने लगता है। तुम्‍हारे चेहरे की मुद्रा बदलने लगती है। और सम्‍मोहन विद जानता है कि कब तुम्‍हारा चेहरा बदलने लगा। एकाएक चेहरे से सारी शक्‍ति गायब हो जाती है। वह मृत वत हो जाता है। मानों गहरी तंद्रा में पड़े हो। जब ऐसा होता है, सम्‍मोहक को उसका पता हो जाता है। उसका अर्थ हुआ कि तीसरी आँख अवधान को पी रही है। आपका चेहरा पीला पड़ गया है। पूरी ऊर्जा त्रिनेत्र केंद्र की और बह रही है।
अब सम्मोहित करने वाला तुरंत जान जाता है। कि जो भी कहा जाएगा। वह घटित होगा। वह कहता है कि अब तुम गहरी नींद में जा रहे हो, और तुम तुरंत सो जाते हो। वह कहता है कि अब तुम बेहोश हो रहे हो और तुम बेहोश हो जाते हो। अब कुछ भी किया जा सकता है। अब अगर वह कहे कि तुम नेपोलियन या हिटलर हो गए हो तो तुम हो जाओगे। तुम्‍हारी मुद्रा बदल जायेगी। आदेश पाकर तुम्‍हारा अचेतन उसका वास्‍तविक बना देता है। अगर तुम किसी रोग से पीडित हो तो रोग को हटने का आदेश देगा, और मजेदार बात रोग दूर हो जायेगा। या कोई नया रोग भी पैदा किया जा सकता है।
यही नहीं, सड़क पर से एक कंकड़ उठा कर अगर सम्मोहन विद तुम्‍हारी हथेली पर रख दे और कहे कि यह अंगारा है तो तुम तेज गर्मी महसूस करोगे और तुम्‍हारी हथेली जल जाएगी—मानसिक तल पर नहीं, वास्‍तव में ही। वास्‍तव में तुम्‍हारी चमड़ी जब लायेगी और तुम्‍हें जलन महसूस होगी। क्‍या होता है? अंगारा नहीं, बस एक मामूली कंकड़ है वह भी ठंडा, फिर भी जलना ही नहीं हाथ पर फफोले तक उगा देता है।
तुम तीसरी आँख पर केंद्रित हो और सम्मोहन विद तुमको सुझाव देता है और वह सुझाव वास्‍तविक हो जाता है। यदि सम्मोहन विद कहे कि अब तुम मर गए, तो तुम तुरंत मर जाओगे। तुम्‍हारी ह्रदय गति रूक जायेगी। रूक ही जाएगी।
यह होता है त्रिनेत्र के चलते। त्रिनेत्र के लिए कल्‍पना और वास्‍तविकता दो चीजें नहीं है। कल्‍पना ही तथ्‍य है। कल्‍पना करें और वैसा ही जाएगा। स्‍वप्‍न और यथार्थ में फासला नहीं है। स्‍वप्‍न देखो और सच हो जायेगा।
यही कारण है कि शंकर ने कहा कि यह संसार परमात्‍मा के स्‍वप्‍न के सिवाय और कुछ नहीं है—यह परमात्‍मा की माया है। यह इसलिए कि परमात्‍मा तीसरी आँख में बसता है—सदा, सनातन से। इसलिए परमात्‍मा जी स्‍वप्‍न देखता है वह सच हो जाता है। और यदि तुम भी तीसरी आँख में थिर हो जाओ तो तुम्‍हारे स्‍वप्‍न भी सच होने लगेंगे।
सारिपुत्र बुद्ध के पास आया। उसने गहरा धान किया। तब बहुत चीजें घटित होने लगीं, बहुत तरह के दृश्‍य उसे दिखाई देने लगे। जो भी ध्‍यान की गहराई में जाता है। उसे यह सब दिखाई देने लगता है। स्‍वर्ग और नरक; देवता और दानव, सब उसे दिखाई देने लगे। और वह ऐसे वास्‍तविक थे कि सारिपुत्र बुद्ध के पास दौड़ा आया। और बोला कि ऐसे-ऐसे दृश्‍य दिखाई देते है। बुद्ध ने कहा, वे कुछ नहीं है। मात्र स्‍वप्‍न है।
लेकिन सारिपुत्र ने कहा कि वे इतने वास्‍तविक है कि मैं कैसे उन्‍हें स्‍वप्‍न कहूं? जब एक फूल दिखाई पड़ता है, वह फूल किसी भी फूल से अधिक वास्‍तविक मालूम पड़ता है। उसमे सुगंध है। उसे मैं छू सकता हूं। अभी जो मैं आपको देखता हूं वह उतना वास्‍तविक नहीं है; आप जितना वास्‍तविक मेरे सामने है, वह फूल उससे अधिक वास्‍तविक है। इसलिए कैसे मैं भेद करूं कि कौन सच है, और कौन स्‍वप्‍न।
बुद्ध ने कहा, अब चूंकि तुम तीसरी आँख में केंद्रित हो, इसलिए स्‍वप्‍न और यथार्थ एक हो गए है। जो भी स्‍वप्‍न तुम देखोगें सच हो जाएगा।
और उससे ठीक उलटा भी घटित हो सकता है। जो त्रिनेत्र पर थिर हो गया, उसके लिए स्‍वप्‍न यथार्थ हो जाएगा। और यथार्थ स्‍वप्‍न हो जाएगा। क्‍योंकि जब तुम्‍हारा स्‍वप्‍न सच हो जाता है तब तुम जानते हो कि स्‍वप्‍न और यथार्थ में बुनियादी भेद नहीं है।
इसलिए जब शंकर कहते है कि सब संसार माया है, परमात्‍मा का स्‍वप्‍न है, तब यह कोई सैद्धांतिक प्रस्‍तावना या कोई मीमांसक वक्‍तव्‍य नहीं है। यह उस व्‍यक्‍ति का आंतरिक अनुभव है जो शिवनेत्र में थिर हो गया है।
अंत: जब तुम तीसरे नेत्र पर केंद्रित हो जाओ तब कल्‍पना करो कि सहस्‍त्रार से प्राण बरस रहा है; जैसे कि तुम किसी वृक्ष के नीचे बैठे हो और फूल बरस रहे है, या तुम आकाश के नीचे हो और कोई बदली बरसने लगी। या सुबह तुम बैठे हो और सूरज उग रहा है और उसकी किरणें बरसने लगी है। कल्‍पना करो और तुरंत तुम्‍हारे सहस्‍त्रार से प्रकाश की वर्षा होने लगेगी। यह वर्षा मनुष्‍य को पुनर्निर्मित करती है, उसका नया जन्‍म दे जाती है। तब उसका पुनर्जन्‍म हो जाता है।

ओशो